Wednesday, April 14, 2021
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The story of Made in India Twitter alternative Koo | देसी ट्विटर ‘कू’ की कहानी, ये अंग्रेजी नहीं जानने वालों का प्लेटफॉर्म; इसे बनाने वाले कभी देश की बड़ी कैब सर्विस के मालिक थे


नई दिल्ली3 घंटे पहले

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कू के को-फाउंडर मयंक बिद्वतका और अप्रमेय राधाकृष्ण(दाएं) आंत्रपेन्योर और इन्वेस्टर हैं। दोनों ने 2017 में भारतीय भाषा के नॉलेज शेयरिंग ऐप ‘वोकल’ को लॉन्च किया था। (फोटो: मयंक के ट्विटर से साभार)

  • ‘आत्मनिर्भर ऐप इनोवेशन चैलेंज’ जीतने वाले माइक्रो ब्लॉगिंग ऐप ‘कू’ का जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में किया
  • 10 लाख से ज्यादा यूजर ‘कू’ यूज करते हैं; कुंबले, श्रीनाथ, रविशंकर प्रसाद जैसे लोग इस प्लेटफॉर्म पर हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार मन की बात में ‘आत्मनिर्भर भारत ऐप इनोवेशन चैलेंज’ के बारे में बात की। इसमें उन्होंने माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म कू (KOO) का जिक्र किया। ये एक तरह का देसी ट्विटर है। इसमें आप भारतीय भाषाओं में अपने विचार लिख सकते हैं। आज की पॉजिटिव स्टोरी में इसी ऐप की कहानी, जो बताती है कि इस देश की विविधता को ध्यान में रखकर प्लान किया गया आइडिया आपको सफलता दिला सकता है।

सबसे पहले बात उस चैलेंज की जिसका जिक्र पीएम मोदी ने किया। दरअसल, 15-16 जून को भारत-चीन झड़प के बाद तनाव की बीच देश में कई चीनी ऐप्स पर बैन लगाया गया। इसी बीच प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत चार जुलाई को ‘ऐप इनोवेशन चैलेंज’ लॉन्च किया। आठ कैटेगरी में करीब सात हजार एंट्री आईं। इनमें से दो दर्जन ऐप्स को अवॉर्ड दिया गया। माइक्रो ब्लॉगिंग ऐप कू भी विजेताओं में शामिल था।

बात ‘कू’ को बनाने वाले आइडिया की

इसे बनाने वाली कंपनी कहती है कि हमारे देश में केवल 10% लोग ऐसे हैं जो अंग्रेजी बोलते हैं। देश की 138 करोड़ आबादी में करीब सौ करोड़ लोग हैं, जो अंग्रेजी नहीं जानते हैं। ये लोग देश की सैकड़ों भाषाओं में से कोई एक भाषा जरूर बोलते हैं। ये भी अब स्मार्टफोन के जरिए इंटरनेट एक्सेस कर रहे हैं। कू इन लोगों को अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति की आजादी देता है।

कू के को-फाउंडर अप्रमेय राधाकृष्ण और मयंक बिद्वतका आंत्रपेन्योर और इन्वेस्टर हैं। दोनों ने 2017 में भारतीय भाषा का नॉलेज शेयरिंग ऐप ‘वोकल’ लॉन्च किया था। इस वक्त वोकल 11 भाषाओ में यूजर्स को सवाल पूछने और जवाब देेने की सुविधा देता है।

टैक्सी फॉर श्योर के मालिक थे अप्रमेय

अप्रमेय राधाकृष्ण ने एनआईटी कर्नाटक से बीई करने के बाद आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए किया। इन्फोसिस में नौकरी की। नौकरी छोड़कर 2010 में कैब सर्विस टैक्सी फॉर श्योर की शुरुआत की। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक बार अप्रमेय अपने दोस्त रघु के साथ शराब पी रहे थे। इसी दौरान दोनों को ‘टैक्सी फॉर श्योर’ का आइडिया आया। कुछ ही साल में ये देश की बड़ी कैब सर्विस कंपनी में से एक थी। 2015 में अप्रमेय ने टैक्सी फॉर श्योर को बेच दिया। इसके लिए उन्होंने ओला से 200 मिलियन डॉलर (मौजूदा दर से करीब 1,467 करोड़ रुपए) की डील की। टैक्सी फॉर श्योर को बेचने के बाद इन्वेस्टर के रूप में काम करने लगे।

लॉन्च होने के एक हफ्ते बाद ही एक लाख यूजर हुए

बात कू की करें तो, इसी साल मार्च में इसे अप्रमेय राधाकृष्ण और मयंक बिद्वतका ने ऑफिशियली लॉन्च किया। लॉन्च के एक हफ्ते बाद ही इस प्लेटफॉर्म को एक लाख से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके थे। इस वक्त ये आंकड़ा दस लाख को पार कर गया है। इस प्लेटफॉर्म पर आप चार सौ कैरेक्टर में अपनी बात रख सकते हैं। चाहें तो एक मिनट के ऑडियो या वीडियो में भी अपनी बात कह सकते हैं।

कुंबले, श्रीनाथ, रविशंकर प्रसाद जैसे लोग इस प्लेटफॉर्म पर

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद, पूर्व क्रिकेटर अनिल कुंबले, जवागल श्रीनाथ, एक्टर आशुतोष राणा, आशीष विद्यार्थी, फिल्म क्रिटिक तरण आदर्श जैसे लोग इस प्लेटफॉर्म पर हैं। फिलहाल ये ऐप हिंदी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषा में लिखने की आजादी देता है। अगले एक साल में कंपनी कुल 11 भारतीय भाषाओं में इसे लॉन्च करेगी। इसमें मराठी, गुजराती, असमी, पंजाबी, मलयालम, बंगाली और उड़िया जैसी भाषाएं शामिल हैं। खास बात ये है कि ये ऐप अंग्रेजी को सपोर्ट नहीं करता।

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