आपने रेगिस्तान देखा, सुना होगा या उसका दौरा भी किया होगा। इस चकाचौंध भरी दुनिया के लिए वह एक नर्क से कम नहीं है तेज धूप, धूल भरी आंधी, रेत के टीले और ठंडी रातों की कल्पना मात्र से लोग सपने में भी वहां जाना नहीं चाहते हैं। पहले की सदियों में खाड़ी देशों के लोगों को जीवन जीने के लिए जरूरी वस्तु का बंदोबस्त करने में ही सारा दिन लग जाता था। एक कहावत है कि वक्त बदलने में समय नहीं लगता, वह खाड़ी देशों की आज की हालत देख समझ आ सकता है।

आज दुनिया के इस कोने की काया पलट गई है। एक बार आने वाले का यहां से जाने का मन नहीं करता है। पूरी दुनिया में कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाले देश आज प्रौद्योगिकी में भी काफी आगे है। इंटरनेट आॅफ थिंग, वर्चुअल रियलिटी, रोबोटिक्स, अक्षय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में विज्ञान के चमत्कार से खाड़ी देशों में सुख-सुविधा, व्यवसाय पनपा और वह निवेशकतार्ओं की पहली पसंद बन कर उभरा है। लेकिन केवल तेल ही नहीं, बल्कि इच्छा और जीवट भी उन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए चाहिए।

रक्षा क्षेत्र में सबसे आगे इजरायल ने सन् 1960 में आधुनिक ड्रिप सिंचाई का आविष्कार कर रेत में हरियाली से सबको स्तब्ध कर दिया। वहीं शून्य अपराध दर वाले गगनचुंबी इमारतों से सजा देश दुबई अब ‘सोने की चिड़िया’ के नाम से जाना जाने लगा है। आठ सौ अट्टाईस मीटर ऊंचे बुर्ज खलीफा की चर्चा कहां नहीं है। कहा जाता है कि विश्व की चौबीस फीसद क्रेनें दुबई में हैं। आस्था के केंद्र सऊदी अरब भी विकास में किसी से पीछे नहीं।

पूर्व और पश्चिम के मिलन स्थल तुर्की के ऊर्जा मंत्री के अनुसार, पूरे देश में बाईस मिलियन वर्ग मीटर के सोलर पैनल के साथ तुर्की ऊर्जा की लागत पर प्रति वर्ष दो सौ मिलियन डॉलर बचाता है। वहीं ‘डायमंड सिटी’ नाम से विख्यात कतर दावे के मुताबिक 2022 विश्व कप में कुछ ऐसा पेश करने जा रहा है, जो मानव सभ्यता ने देखा नहीं था। होटल, थीम पार्क, आधुनिक डिजाइन ग्राउंड और उन्नत इमारतें सबका मन मोह लेंगी। द्वीपों के समूह बहरीन भी कम बेहतरीन नहीं। जॉर्डन ने अरब के साइबर प्रोग्रामर गुरु बनने की ठान ली है ।

हालांकि यह आश्चर्य की बात नहीं है। आखिर मानव सभ्यता विकास के मार्ग पर अग्रसर रही है। सच यह है कि खाड़ी देशों के लोगों ने असंभव को संभव कर दिखाया है। उन देशों में बेशक धन की कमी नहीं है, पर उनकी कड़ी लगन की कीमत आज उन्हें छप्पर फाड़ कर मिल रही है। यह कल्पना और इच्छाशक्ति का ही जीवंत रूप है।
’सुनील चिलवाल, हल्द्वानी, उत्तराखंड

जरूरत के बरक्स

हाल ही में नए संसद भवन का शिलान्यास किया गया। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखें और पुराने संसद भवन का ध्यान रखें तो फिलहाल नए संसद भवन की जरूरत शायद हमारे देश को उतनी नही है, जितनी आम लोगों को पेट भरने या दूसरी अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने की है।

राष्ट्रीय एकता के भाव को दशार्ने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनाने जैसे फैसलों से ज्यादा अगर आम आदमी की तकलीफों की चिंता की जाए तो बेहतर होगा। करीब एक हजार करोड़ रुपए को सही तरीके से खर्च किया जाए तो करोड़ों लोगों के जीवन को फिर से सहज और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

पिछले कुछ महीनों के दौरान जिन्होंने अपनी नौकरियां गवाई हैं या कई लोगों की मौत हो गई, उनके परिजनों की मदद की जा सकती है। देश लोगों से मजबूत होता है। जो चीज पहले से अच्छी हालत में है, उसे किनारे करने को पता नहीं कैसे देखा जाए!

देश में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार वर्षों में भारत के अनेक बड़े राज्यों में बच्चों की स्थिति बदतर हुई हैं। ये बच्चे कुपोषण जैसी कई दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। बच्चों की शुरुआती उम्र में, जब उन्हें सबसे ज्यादा पोषण की जरूरत होती हैं, तभी उन्हें वह कम मिलता है।

इस वजह से वे नाटे, दुबले और दुर्बल होते हैं। इसके अलावा, कुछ बच्चों की जान पांच महीने से कम समय में चली जाती हैं। इनमें से कुछ बच कर बड़े हो भी जाएं तो भी वे शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। जब हमारा आने वाला भविष्य ही कमजोर होगा तो हम अच्छे भविष्य की कामना कैसे कर सकते हैं!
’अनिमा कुमारी, पटना, बिहार

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