यों इस विशेष काल में चारों ओर से विटामिन-सी की ही चर्चा सुनाई पड़ती है, पर विटामिन-डी भी इतना ही जरूरी है। उसे प्राप्त करने का यह सुनहरा मौका है। हर साल सर्दियों की धूप हमारी पीढ़ी के लिए बहुत पुरानी स्मृतियां लेकर भी आती हैं।

रजाई-गद्दे भी धूप खाने के लिए रखे जाते थे। धूप वाली जगह कम हो तो एक छोटी मोटी महफिल ही ‘धूप खाने’ के लिए जुट जाती थी! असल में धूप सेंकने की ही चीज नहीं है। हमारी अपनी हिंदी में उसे ‘खाने’ वाली चीज के समकक्ष रखा गया है। बांग्ला भाषा के शब्द-व्यवहार की भी याद आ सकती है, जिसमें कोई द्रव्य या दाल-भात, सबके लिए ‘खाने’ का ही इस्तेमाल किया जाता है।

आपसे पूछा जाता है, ‘चा खाबेन’, ‘जल खाबेन’ यानी चाय पीएंगे, पानी पीएंगे! जो हो, धूप भला किसे प्रिय नहीं होती। ठंडे मुल्कों में तो उसका उत्सव ही मनाया जाता है, जितनी देर वह रहती है, सेंकने को मिलती है। समुद्र, नदी और झील किनारे भीड़ होती है। आंखें मूंद कर लोग लेट ही नहीं जाते, अक्सर सो भी जाते हैं। ठंड के दिनों में जब तक धूप रहती है, मानो पूरा घर ही बाहर आ जाता है, जितनी भी जगह धूप के टुकड़ों के साथ रहने को मिले।

हां, खुली या चारों ओर फैली धूप ही नहीं, उसका एक टुकड़ा भी कीमती होता है। उसके इसी मूल्य को तो सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कविता में और निर्मल वर्मा ने अपनी कथा में दर्ज किया है। धूप का टुकड़ा निर्मल जी को एक खरगोश की तरह दिखा। धूप उपमा, प्रतीक के लिए भी काम आती रही है। उसने फल पकाए हैं, फसलें पकाई हैं और अपने ताप से जीवन में रंग भरे हैं। कवि त्रिलोचन ने लिखा है-, ‘ताप के ताये हुए दिन’। उन्होंने धूप को कई बार बड़े अनोखे अंदाज में प्रस्तुत किया है।

आजकल दरअसल धूप के सौंदर्य को याद करने वाले दिन भी आए हैं। ठंड के दिनों में धूप को देखते हुए उसके सौंदर्य की कई स्मृतियां जागती हैं। साहित्यिक रचनाओं और कलाकृतियों से मिली हुई स्मृतियां भी। सो, अक्सर याद आती हैं वे चेष्टाएं जो धूप को ‘पेंट’ करने की भी रही है। विंसेंट वान गॉग के यहां तो धूप एक जरूरी उपस्थिति की तरह रही है, उनकी अनेक कलाकृतियों में। वे धूप पेंट करने वालों में अग्रिम पंक्ति में बैठने के सहज ही अधिकारी हैं। अपने देश भारत के मिनियेचर चित्रों को भी याद किया जा सकता है।

राजस्थानी परंपरा वाले मिनियेचर चित्र हों, या बसोहली-कांगड़ा के, धूप के कई रूप देखते ही बनते हैं। फिल्मों में भी धूपीले या धूप-दाही रंग न जाने कितनी बार खिले हैं। ‘तीसरी कसम’ जैसी फिल्म-कथा में वहीदा रहमान के चेहरे पर पड़ने वाली धूप का (जब वह बैलगाड़ी में बैठी होती है) रंग-रूप देखते ही बनता है। और सत्यजित राय की फिल्म ‘चारुलता’ में पसरी हुई धूप के बीच, जिसमें चारु अपने देवर के साथ घर से लगे उद्यान में बैठी होती है। याद करने पर या सहज ही न जाने कितना कुछ याद आएगा! फिल्म के साथ ही छायांकन। उसमें भी तो धूप-छाया की, प्रकाश-अंधेरे की, रंगतों की एक विशेष भूमिका होती है।

भारत में धूप खाने के साथ मूंगफली छील कर खाने का आनंद उठाना आज भी न जाने कितने लोगों को प्रिय है। धूप आती है तो स्मृतियां तो लाती ही है, खाने-पीने की चीजें भी साथ लाती है। सर्दियों की ‘पिकनिक’ की न जाने कितनी तस्वीरें कितनी पीढ़ियों की किसी एलबम में सजी, कितने ही घरों में रखी होंगी। हमारे पास भी हैं।

जाहिर है, धूप का यह गुणगान खत्म होने वाला नहीं है। दिल्ली से सटे नोएडा में जहां मैं रहता हूं, सोसायटी के स्त्री-पुरुष धूप में कुर्सियां डाल कर बैठते हैं। मैं भी चला जाता हूं घंटे भर के लिए। हर वर्ष की तरह अलग अपनी एक कुर्सी डाल कर लिखता-पढ़ता हूं। कभी तितलियों को निहारता हूं, कभी फूल-पौधों और सदाबहार फलों को। चंपा के फूलों को खासतौर पर। वे धूप में चमकते-से हैं। यह उनका मौसम है। याद करता हूं ‘हरसिंगार’ को। उसका भी तो यही मौसम है। हमारे परिसर में था एक पेड़। अब नहीं है। मेरे आग्रह पर इस वर्ष कुछ पौधे लगवाए गए हैं। वह धूप का फूल नहीं है, रात से भोर तक झरता है। पर धूप आने पर जमीन पर गिरा हुआ मिलता है। असम-बंगाल में उसकी बड़ी महिमा है।

जो भी हो, धूप, धूप है। सचमुच बहुतों को, बहुत कुछ को, खिला देती है। त्रिलोचन लिखते हैं- ‘धूप सुंदर/ धूप में/ जग रूप सुंदर/ …ओस कण के हार पहने/ इंद्रधनुषी छवि बनाए/ शस्य नृण/ सर्वत्र सुंदर/ धूप सुंदर/ धूप में जग रूप सुंदर।’ पर, इस बार भी दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में धूप को भी छिपा देने वाले प्रदूषण का खतरा मंडरा रहा है। तो प्रदूषण को रोकने के लिए जो कुछ कर सकते हों, करें। तभी दिखेगा ‘धूप में जग रूप सुंदर’ और अधिक, और अधिक मनभावन।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो



सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई






Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here