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20 मिनट पहले

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अहमद पटेल के बाद मोतीलाल वोरा का जाना सोनिया गांधी के लिए निजी तौर पर बड़ा नुकसान है। (फाइल फोटो)

दिग्गज कांग्रेसी मोतीलाल वोरा (93) नहीं रहे। अहमद पटेल के बाद मोतीलाल वोरा का जाना सोनिया गांधी के लिए निजी तौर पर बड़ी क्षति है, क्योंकि वोरा सोनिया गांधी के बेहद विश्वसनीय करीबियों में से एक थे। कांग्रेस में एक ऐसा रिक्त स्थान हो गया है, जिसे भरना अब चुनौती है।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राशिद किदवई ने मोतीलाल वोरा के निधन और कांग्रेस के लिए इसके मायने भास्कर से साझा किए।

मोतीलाल वोराजी ने कांग्रेस में लंबी पारी खेली। दिखने में मोतीलाल वोरा कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ता थे। वे कांग्रेस में आए, अपना स्थान बनाया और आगे बढ़े। उनका कांग्रेस में महत्वपूर्ण स्थान था। मुझे लगता है कि अहमद पटेल के बाद मोतीलाल वोरा का निधन सोनिया गांधीजी के लिए व्यक्तिगत तौर पर बड़ी क्षति है। वे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे और पूरी ईमानदारी से इस जिम्मेदारी को निभाया।

जब अहमद पटेल कोषाध्यक्ष थे, तब भी वोरा और पटेल, दोनों मिलकर ही चेक पर दस्तखत करते थे। कांग्रेस में कितना पैसा आ रहा है और जा रहा है, इसका पूरी ईमानदारी से हिसाब रखते थे। पैसा कहां से आ रहा है, कहां खर्च हो रहा है, इस बात को लेकर सोनिया गांधी निश्चिंत रहती थीं। कांग्रेस के लिए अब पार्टी की फंडिंग और उसके हिसाब-किताब को लेकर चुनौती रहेगी।

वजह ये कि ये बेहद गोपनीय होता है और तमाम राजनीतिक दलों में ऐसा होता है। मोतीलाल वोरा सोनिया गांधी के अटूट विश्वासपात्र थे। एके एंटनी, अहमद पटेल, मोतीलाल वोरा, सुशील कुमार शिंदे के बारे में ये कहा जाता है कि अगर इनकी जानकारी में कोई चीज आती थी, तो वे अपनी पत्नियों और परिवार के किसी सदस्य को इसकी भनक नहीं लगने देते थे।

अहमद पटेल के बाद मोतीलाल वोरा, बदलाव को मजबूर होगी कांग्रेस!
कांग्रेस एक चीज के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो रही है कि कांग्रेस में आमूलचूल बदलाव होना चाहिए था। पटेल और वोरा इंदिरा, राजीव, सीताराम केसरी, नरसिम्हा राव और सोनिया गांधी के वक्त भी काफी सक्रिय रहे हैं। ऐसे में अब जरूरी है कि कांग्रेस में एक बड़ा बदलाव आए और लोगों को जिम्मेदारी दी जाए। कांग्रेस में जो बड़े नेता थे, पार्टी ने उन्हीं को पदों पर जारी रखा।

आज आप भाजपा में देखिए, जो लोग अटलजी के समय मंत्री थे, उनमें से अब काफी कम लोग नजर आते हैं। वहां अब नई खेप तैयार हो गई है। निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, हरदीप पुरी, स्मृति ईरानी और एस जयशंकर जैसे लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। कांग्रेस में उस तरह का बदलाव नहीं आया और संगठन में भी ऐसा ही है। ओल्ड गार्ड वर्सेस यंग की राजनीति में मैं नहीं जाना चाहता, पर दुख और तकलीफ इस बात की होती है कि जो बदलाव होना चाहिए था कांग्रेस में वो नहीं हुआ।

मोतीलाल वोरा का व्यक्तित्व
वोराजी काफी मिलनसार और मधुर व्यक्ति थे। असाधारण व्यक्तित्व था उनका और वो अनेक लोगों से मिलते थे। अभी कोरोनाकाल को छोड़ दें तो उससे पहले जब कांग्रेस मुख्यालय में कोई मिलने के लिए जाता था तो उससे मिलने वाला कोई नहीं होता था। कार्यकर्ताओं से मिलने के लिए केवल दो लोग कांग्रेस मुख्यालय में मौजूद होते थे। एक मोतीलाल वोरा और दूसरे दिग्विजय सिंह।

मोतीलाल वोरा सबसे मिलते थे और उन्होंने एक सिस्टम बनाया था कि उनसे मिलने वाला बैठ भी नहीं पाता था और उसके लिए चाय आ जाती थी। इससे दक्षिण, उत्तर और दूरदराज से आने वाले कार्यकर्ता को भी यह लगता था कि वो एक महत्वपूर्ण नेता से मिल लिया है और दूसरा सोनिया गांधी तक भी जमीनी सूचनाएं पहुंच जाती थीं।

हर चीज में एक पॉजिटिव सोच रखते थे
मोतीलाला वोरा गंभीर व्यक्ति भी थे और विनोदी स्वभाव के भी थे। तब अटलजी का समय चल रहा था। कांग्रेस मुख्यालय में एक बहुत बड़ा पेड़ था। अप्रैल-मई में अंधड़ के दौरान ये पेड़ गिर गया। मैंने वोराजी से कहा कि इतना पुराना पेड़ है और इसकी जड़ें मजबूत थीं। इस पेड़ का गिरना क्या कांग्रेस के बारे में कुछ कहता है?

वोराजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि देखो इस पेड़ के गिरने से इतनी जगह निकल आई। वो हर चीज में एक पॉजिटिव सोच रखते थे। वो कांग्रेस की सूचनाएं नहीं देते थे, लेकिन हर किसी को वे जवाब जरूर देते थे। ये बात आज के उन नेताओं को सीखनी चाहिए, जो कार्यकर्ताओं या पत्रकारों को जवाब नहीं देते हैं। वे एक अच्छे इंसान थे और उन्हें लोगों की फिक्र रहती थी।



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