Saturday, June 19, 2021
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know Auspicious time and puja vidhi and Rules


साल की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। यह एकादशी ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आती है। ऐसे में इस साल 2021 में 21 जून को Nirjala Ekadashi है।

इस दिन कठोर नियमों का पालन करते हुए भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन और उपवास किया जाता है।दरअसल बिना पानी के व्रत को निर्जला व्रत कहते हैं और निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है।

उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला Ekadashi Vrat सबसे कठिन होता है। निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं। वहीं सामान्य एकादशी में केवल अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है।

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वहीं साल 2021 के जून में क्रमश: दो एकादशी 6 जून 2021 को अपरा एकादशी व 21 जून 2021 को निर्जला एकादशी पड़ रही है। इसके अलावा 21 जून को ही मां गायत्री का जन्मोत्सव है। Maa Gayatri को वेद माता भी कहा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार गायत्री जयंती का पर्व प्रति वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है।

निर्जला एकादशी का शुभ मुहूर्त और पारण…
एकादशी तिथि का प्रारंभ: 20 जून 04.21 PM – 21 जून 01.31 PM
एकादशी तिथि का समापन : 21 जून 01:31 PM –22 जून 10.44 AM
पारण का समय : 22 जून सुबह 5.21 AM से 08.12 AM तक

निर्जला एकादशी का महत्व…
मान्यता के अनुसार जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशी का उपवास करने में सक्षम नहीं है उन्हें केवल निर्जला एकादशी Vrat करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।

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निर्जला एकादशी : पाण्डव एकादशी और भीमसेनी या भीम एकादशी…
निर्जला एकादशी से सम्बन्धित पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी और भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। Pandav’s में दूसरा भाई भीमसेन खाने-पीने का अत्यधिक शौकीन थे और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं था, इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाता था। भीम के अलावा बाकि पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे।

भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान थे। भीमसेन को लगता था कि वह Ekadashi Vrat न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहे हैं। इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गया तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने कि सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।

Ekadashi Vrat Vidhi : एकादशी व्रत विधि-
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करने के बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। इसके साथ ही सभी देवी- देवताओं का गंगा जल से अभिषेक करते हुए भगवान विष्णु को पुष्प अर्पित करें।

इस दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की भी Puja– अर्चना की जाती है। साथ ही यदि संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें। वहीं भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु बिना तुलसी के भोग स्वीकार नहीं करते हैं। इस बात का ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन Lord Vishnu का अधिक से अधिक ध्यान करें।

इसलिए वर्जित है एकादशी के दिन चावल…
सनातन धर्म में कई प्रकार के व्रत और त्योहारों के माध्यम से मनुष्यों के नैतिक उत्थान का मार्ग बताया गया है। इन सबमें एकादशी व्रत का महात्म्य सबसे ज्यादा है। हर वर्ष में 24 एकादशी (हर महीने दो एकादशी) आती हैं। Aadhik maas या मलमास में इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। धर्माचार्यों के अनुसार एकादशी के व्रत में चावल खाने की मनाही है। आइए जानते हैं कि आखिर एकादशी व्रत के दिन चावल को क्यों वर्जित बताया गया है?

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एकादशी के दिन चावल को बिल्कुल वर्जित माना गया है। चावल नहीं खाना Ekadashi Rules में शामिल होता है और ऐसी मान्यता है कि जो इस दिन चावल खाता है, वह इंसान योनि से अलग होकर उसका जन्म प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में होता है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर का त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। चावल और जौ के रूप में महर्षि मेधा उत्पन्न हुए इसलिए चावल और जौ को जीव माना जाता है।

जिस दिन महर्षि मेधा का अंश पृथ्वी में समाया, उस दिन एकादशी तिथि थी। इसलिए एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना गया। मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस और रक्त का सेवन करने जैसा है।

इसलिए वर्जित है एकादशी के दिन अन्न…
18 पुराणों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद्मपुराण के चौदहवें अध्याय में एकादशी की व्याख्या व्यासदेव ने जैमिनी ऋषि के समक्ष की है। व्यासजी के अनुसार समस्त भौतिक जगत की उत्पत्ति करते हुए परम पुरुष भगवान विष्णु ने पापियों को दण्डित करने के लिए पाप का मूर्तिमान रूप लिए एक व्यक्तित्व की रचना की।

इसे पापपुरुष के रूप में पहचाना गया। पापपुरुष के दोनों हाथ और दोनों पांव की रचना अनेकों पाप कर्मों से की गई। वहीं इस पापपुरुष को नियंत्रित करने के लिए यमराज की उत्पत्ति अनेक नरकीय ग्रह प्रणालियों की रचना के साथ हुई।

वे जीवात्माएं जो अत्यंत पापी होती हैं उन्हें यमराज के पास भेज दिया जाता है जिससे यमराज, जीव को उसके पापों के भोगों के अनुसार नरक में पीड़ित होने के लिए भेज देते हैं। इस प्रकार जीवात्माएं अपने कर्मों के अनुसार सुख और दुख भोगने लगीं।

इधर इतनी सारी जीवात्माओं को नरक में कष्ट भोगते देख जगद्पालक विष्णु को भी बुरा लगने लगा। तब उनकी सहायतावश भगवान ने अपने स्वयं के स्वरूप से पाक्षिक एकादशी के रूप को अवतरित किया। इस कारण एकादशी एक चंद्र पक्ष के पंद्रहवें दिन उपवास करने के व्रत का व्यक्तिकरण है। इस प्रकार एकादशी और भगवान श्री विष्णु अलग-अलग नहीं हैं।

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वहीं जब विभिन्न पापकर्मी जीवात्माएं एकादशी व्रत का नियम पालन करने लगीं और इसकी वजह से उन्हें तुरंत ही बैकुंठ धाम की प्राप्ति होने लगी तब पापपुरुष को अपने अस्तित्व पर ही संकट दिखलाई देने लगा।

वह भगवान विष्णु के समीप पहुंचा और प्रार्थना करते हुए बोला,’हे प्रभु, मैं आपके द्वारा निर्मित आपकी ही कृति हूं और मेरे माध्यम से ही आप घोर पापकर्मों वाले जीव को अपनी इच्छा से पीडि़त करते हैं, परन्तु अब एकादशी के प्रभाव से मेरा ह्रास हो रहा है।

आप कृपा करके मेरी रक्षा करें। मुझे ऐसा कोई स्थान ज्ञात नहीं है जहां मैं एकादशी के भय से मुक्त रह सकूं। हे प्रभो, कृपा कर मुझे ऐसे स्थान का पता बताएं जहां मैं निर्भीक होकर वास कर सकूं।’

पापपुरुष की स्थिति पर विचार करते हुए भगवान विष्णु ने कहा,’हे पापपुरुष, उठो, अब और शोकाकुल मत हो, केवल सुनो और मैं तुम्हें बताता हूं कि तुम एकादशी के पवित्र दिन पर कहां निवास करते हो।

एकादशी का दिन जो त्रिलोक में लाभ देने वाला है, उस दिन तुम अन्न जैसे खाद्य पदार्थ की शरण में जा सकते हो। अब तुम्हारे पास शोकाकुल होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि मेरे ही स्वरूप में श्री एकादशी देवी अब तुम्हें अवरोधित नहीं करेंगी।


पापपुरुष को आश्वासन देने के बाद भगवान श्री विष्णु अंतर्ध्यान हो गए। भगवान विष्णु के निर्देशानुसार संसार भर में जितने भी पापकर्म पाए जा सकते हैं, वे सब इन (अनाजों में) खाद्य पदार्थों में निवास करते हैं, इसलिए वे मनुष्य जो कि जीवात्मा के आधारभूत लाभ के प्रति सजग होते हैं वे कभी एकादशी के दिन अन्न नहीं ग्रहण करते हैं।

निर्जला एकादशी के उपाय (Nirjala Ekadashi Upay)

: निर्जला एकादशी के दिन दूध में केसर मिलाकर अभिषेक करने से भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।
: निर्जला एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्र का पाठ करने से कुंडली के सभी दोष समाप्त होते हैं।
: निर्जला एकादशी के दिन भोग में भगवान विष्णु को पीली वस्तुओं का प्रयोग करने से धन की बरसात होती है।
: निर्जला एकादशी के दिन गीता का पाठ भगवान विष्णु की मूर्ति के समाने बठकर करने से पित्रों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
: भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना पूरी नहीं होती है। इसलिए निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु को भोग में तुलसी का प्रयोग अवश्य करें।





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