यह एक अफसोसनाक दिन था। जबकि हमारे बल्लेबाज शुरू से ही दुनिया के गेंदबाजों के लिए सिरदर्द रहे है। सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग की बल्लेबाजी का लोहा पूरी दुनिया मानती रही है।

इस शर्मनाक प्रदर्शन को देख कर हरफनमौला कपिलदेव की याद आती है, जिन्होंने 1983 के विश्वकप मैच के दौरान जिम्बाब्वे के विरुद्ध सत्रह रन पर पांच विकेट गिराने के बाद अकेले एक सौ पचहत्तर रन बनाए। लेकिन आज ऐसा लगता है कि महामारी के दौर का असर खेल पर भी पड़ गया है।

लंबे समय से सभी खिलाड़ी क्रिकेट से दूर रहे। टेस्ट क्रिकेट में एक अच्छे ओपनर बल्लेबाज की तलाश आज भी पूरी नहीं हुई है, जबकि शुरुआत करने वाले बल्लेबाजों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। सभी खिलाड़ियों को पूरी एकाग्रता और मेहनत से अपने खेल पर ध्यान देना चाहिए। उनके खेल पर पूरे देशवासियों की नजर रहती है। अच्छा यह हो कि हमारी टीम को इस अफसोसनाक दिन को भूल कर नए उत्साह से साथ अगले टेस्ट मैच में वापसी करने का प्रयास करना चाहिए।
’हिमांशु शेखर, केसपा, गया, बिहार

जोखिम के अस्पताल

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि देश के कोविड सेंटर भी सुरक्षित नहीं हैं। एक तो मरीज पहले से ही बीमारी की चिंता से ग्रस्त होते हैं, ऊपर से उसे अपनी सुरक्षा का भय सताने लगता है। कोविड सेंटर में आग और उसमें जल कर मरे मरीजों की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार की खिंचाई की और सवाल पूछा कि बड़ी संख्या में वहां के अस्पतालों में एनओसी क्यों नहीं है? मुद्दा वाकई ज्वलंत है और हर हाल में इस समस्या का समाधान जरूरी है। तभी मरीज अस्पतालों में सुरक्षित रह सकेंगे।

देशभर में कोविड सेंटरों में आग से सुरक्षा की माकूल व्यवस्था नहीं होने से कई हादसे हो चुके हैं। ऐसे में कोर्ट की चिंता बड़ी है कि आज अगर मरीज बीमारी से जान बचाने के लिए अस्पतालों में भर्ती होता है तो वहां उसकी सुरक्षा जरूरी है। आग से बचने के उपायों की कमी के चलते हो रहे हादसों में मरीज मर रहा है, यानी उसकी जिंदगी की कोई गारंटी नहीं है। गुजरात ही नहीं अन्य राज्यों की सरकारें भी स्वत: इस मामले में संज्ञान लें और पर्याप्त सुरक्षा मुहैया करवाए।
’अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, मप

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