हरारी ने मौजूदा दौर की व्याख्या एक आधुनिक दार्शनिक के तौर पर की है। वे जहां एक तरफ मौजूदा समय को समझने के लिए नई दृष्टि लेकर आए, वहीं उन्होंने सबसे पहले आगे बढ़कर यह कहा कि कोरोना संकट अपनी पूरी बनावट में सभ्यता संकट कहीं ज्यादा है।

हरारी की सबसे बड़ी स्थापना नए दौर में राज्यसत्ता की वापसी को लेकर है। एक ऐसे समय में जब हम या तो दुनियाभर में सरकारों को उत्तरायण से दक्षिणायन होते देखकर भय और आशंका के साथ भविष्य को पढ़ने में लगे थे या फिर यह कह रहे थे कि आवारा पूंजी की ताकत सभ्यता और मानवता के बीच जिस सिर्फ एक शिनाख्त को बाकी रहने देगी और वह है उपभोक्ता।

ऐसे में हरारी राज्यसत्ता की मजबूत वापसी की व्याख्या करते हुए कहते हैं, ‘क्या होगा जब सब लोग घर से काम करेंगे और सिर्फ दूर से संवाद करेंगे? क्या होगा जब सारे शिक्षण संस्थान आॅनलाइन हो जाएंगे? आम दिनों में सरकारें, व्यवसाय और संस्थान ऐसे प्रयोगों के लिए तैयार नहीं होंगे, लेकिन यह आम समय नहीं है। संकट के इस समय में हमें दो अहम फैसले करने हैं। पहला तो हमें सर्वाधिकार संपन्न निगरानी व्यवस्था (सर्विलांस राज) और नागरिक सशक्तीकरण में से एक को चुनना है। दूसरा, चुनाव हमें राष्ट्रवादी अलगाव और वैश्विक एकजुटता के बीच करना है।’

कोरोना के अनुभव के दौरान हमने देखा कि चीन से शुरू होकर ब्राजील, आॅस्ट्रेलिया, जर्मनी और ब्रिटेन तक की सरकारों ने कैसे बड़े फैसले किए, जिससे समाज और नागरिकता से जुड़े सारे सरोकार धरे के धरे रह गए। राज्यसत्ता की ऐसी ताकत और उसके उपयोग का यह एक नया ही अनुभव है। हरारी जिस ‘सर्विलांस राज’ की बात करते हैं, उसके लिए वे कहते हैं, ‘अब तक तो यह होता है कि जब आपकी उंगली स्मार्टफोन से एक लिंक पर क्लिक करती है, तो सरकार जानना चाहती है कि आप क्या देख-पढ़ रहे हैं।

लेकिन कोरोना विषाणु के बाद अब इंटरनेट का फोकस बदल जाएगा। अब सरकार आपकी उंगली का तापमान और चमड़ी के नीचे का रक्तचाप भी जानने लगेगी। सर्विलांस के मामले में कठिनाई यही है कि हममें से कोई पुख्ता तौर पर नहीं जानता कि हम पर किस तरह की निगरानी रखी जा रही है और आने वाले सालों में उसका रूप क्या होगा।’

हरारी अपनी इस बात के जरिए यह साफ करते हैं कि तकनीक और राज्यसत्ता मिलकर इतने ताकतवर होने जा रहे हैं कि इसकी चपेट से बाहर निकलना मुश्किल होगा। क्योंकि तारीख में भी इस तरह का कोई अनुभव इससे पहले नहीं रहा है, जिससे कोई सबक लिया जा सके। साफ है कि निजता के क्षेत्र में यह बड़ा हस्तक्षेप तो है ही व्यक्ति के नागरिक बनने की प्रक्रिया को एक बड़ा आघात भी है।

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