पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का आगाज होने के साथ ही हिंसा की बिसात बिछने लगी है। सियासी वर्चस्व के लिए इलाके सुलगने लगे हैं। राजनीतिक हिंसा की घटनाओं का आगाज होने लगा है। राजनीति में वर्चस्व की जंग का दायरा बढ़ा है। भारतीय जनता पार्टी नया केंद्र बन रही है। राजनीतिक पकड़ साबित करने की होड़ में तृणमूल और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा तो बढ़ ही रही है, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के गुटों के बीच भी मारकाट की खबरें हैं।

हाल में बंगाल के दौरे पर पहुंचे भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा पर हमले के बाद सियासी घमासान तेज हुआ है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता मंझोले स्तर के नेता तो पहले ही हिंसा का शिकार हो रहे थे, भाजपा और तृणमूल के विवाद की आंच प्रशासनिक अधिकारियों तक भी पहुंचने लगी है।

भाजपा प्रमुख नड्डा पर हुए हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार तीन वरिष्ठ आइपीएस अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली बुलाया, लेकिन राज्य सरकार ने उनको भेजने से मना कर दिया। इससे पहले केंद्र सरकार ने मुख्य सचिव आलापन बंद्योपाध्याय और पुलिस महानिदेशक बीरेंद्र को 14 दिसंबर को दिल्ली पहुंचने के लिए समन भेजा। सरकार ने उनको भेजने से मना कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार व राज्य सरकार आमने-सामने हैं। भाजपा के दो कार्यकर्ताओं की हत्या के बाद हालिया तनाव बढ़ा है।

विधानसभा चुनाव की तैयारियों का आगाज स्पष्ट है। इसमें न तो तृणमूल पीछे है और न ही सत्ता की जमीन दखल करने की कोशिश में जुटी भाजपा। दरअसल, बंगाल की राजनीति में जलेबी की तरह रहे ‘अंडरकरंट समीकरणों’ को प्रभावित करने की जमीन हिंसा के सहारे पुुख्ता किए जाने की परंपरा जैसी रही है। चाहे वह ‘ग्राम दखल’ और ‘इलाका दखल’ करने वाले पेशेवर गिरोहों को अपने पाले में करके हो या फिर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में हिंसात्मक झड़पों के जरिए। विवादित रहे नेताओं- कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ी है।

चुनाव दुंदुभि अगले साल मई में बजने वाली है। ‘ग्राम दखल’ और ‘इलाका दखल’ की कवायद में पेशेवर स्थानीय ‘योद्धा’ सक्रिय हैं। जिस दल के हाथ में जितने गिरोह, उसका पलड़ा उतना ही भारी। बंगाल की राजनीति का ‘अंडरकरंट समीकरण’ सीधा-सा यही है कि कहां से किस पार्टी को वोट मिलेंगे, यह ग्राम दखल और इलाका दखल पर ही निर्भर करता है।

इसके लिए सक्रिय गिरोह बाकायदा फीस लेते हैं और गांवों के लोगों में डर बैठाने के लिए लूटपाट से लेकर हिंसक संघर्ष तक हर हथकंडे अपनाते हैं। जरूरत पड़ने पर हत्याएं भी। एक समय मेदिनीपुर के गड़बेता, केशपुर, पांशकुड़ा, भाजाचाउली या मुर्शिदाबाद, हुगली के गोघाट, पुड़शुड़ा, खानाकुल, चमकाईतला आदि इलाकों में ऐसा ही कुछ हुआ था।

कांग्रेस को अपदस्थ कर माकपा ने अपनी जगह बनाई थी। 1999-2001 में जब इन इलाकों में माकपा कमजोर पड़ने लगी और तृणमूल ने नक्सलियों की मदद से जड़ें जमानी शुरू कीं तो स्थानीय गिरोहों को मिलाना शुरू किया। इन इलाकों में सक्रिय गिरोहों की राजनीतिक जवाबदेही इतनी भर है कि जो ज्यादा धन देगा, उसके लिए काम करेंगे। अमूमन ऐसे एक पेशेवर गिरोह मे 35 से 40 ‘योद्धा’ होते है। संकेत मिलते ही रात के अंधेरे में शुरू होता है ‘आॅपरेशन’। तृणमूल कांग्रेस के सांसद और मेदिनीपुर के प्रभावशाली नेता शुभेंदु अधिकारी कहते हैं, ‘किसी की मजाल नहीं, जो हमारे इलाके में घुस आए।’

‘ग्राम दखल’ और ‘इलाका दखल’ में संलिप्त गिरोहों के बारे में बंगाल पुलिस की कई रिपोर्ट्स फाइलों में बंद हैं। 2008 के बाद बंगाल में माकपा को कमजोर होता देख ऐसे गिरोहों ने मौजूदा सत्ताधारी दल के साथ अपनी सक्रियता बढ़ानी शुरू कर दी। मेदिनीपुर, मुर्शिदाबाद, हुगली, वीरभूम के नानूर, उत्तर 24 परगना के शासन, पश्चिम मेदिनीपुर के हल्दिया, दक्षिण 24 परगना के कई इलाकों में वैसे गिरोहों ने माकपा की ‘लाली’ कम करने में अहम भूमिका निभाई।

बंगाल पुलिस के एक आला अधिकारी के अनुसार, ‘बंगाल में खासकर दक्षिण बंगाल में तो लगभग हर इलाके में ऐसे गिरोह सक्रिय हैं। पुलिस की रिपोर्ट है कि हर जिले में ऐसे कम से कम 25-30 गिरोह सक्रिय हैं।’ माना जा रहा है कि चुनाव करीब आने के साथ ही राजनीतिक वर्चस्व जंग अभी और तेज होगी। राजनीतिक वर्चस्व की होड़ में बंगाल 39-40 साल पहले के मोड़ पर खड़ा है। राजनीतिक नफे-नुकसान की होड़ में बंगाल के ग्रामीण इलाके एक बार फिर बारूद के ढेर पर हैं।

राजनीतिक हिंसा : कुछ तथ्य

1-बंगाल में पिछले दो साल में कम से कम चार हाई-प्रोफाइल राजनीतिक हत्याएं हुई हैं।
2- कुछ दिन पहले ही उत्तर 24 परगना में टीटागढ़ थाने से कुछ मीटर दूर भाजपा पार्षद मनीष शुक्ला को गोलियों से भून दिया गया था।
3- जुलाई में उत्तर दिनाजपुर जिले में भाजपा विधायक देवेंद्रनाथ रॉय का शव रहस्यमय परिस्थितियों में फांसी पर लटका मिला था।
4- तृणमूल के विधायक सत्यजीत बिस्वास की पिछले साल सरस्वती पूजा के दिन नदिया जिले में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
5-प्रभावशाली तृणमूल नेता निर्मल कुंडू की जून 2019 में उत्तर 24 परगना जिले के निमता में गोली मारकर हत्या कर दी गई ।
6-नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, बंगाल में 2018 में सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्याएं हुईं। पूरे देश में दर्ज 54 राजनीतिक हत्याओं में से 12 अकेले बंगाल में दर्ज हुईं। 1999 और 2016 के बीच 18 साल बंगाल में हर साल 20 राजनीतिक हत्याएं हुईं।
7- बंगाल में सबसे ज्यादा राजनीतिक मौतें 2009 में हुईं। इसके बाद 2000, 2010 और 2011 में, 38 राजनीतिक हत्याएं हुईं।

‘बंगाल में तृणमूल का हाथ पकड़कर भाजपा घुस आई और अब हिंसा के रास्ते अपनाकर राज्य में सत्ता पाना चाहती है।’
– सूर्यकांत मिश्र, माकपा नेता

‘हमारी पार्टी हिंसा और हत्या की राजनीति पर भरोसा नहीं करती। भाजपा के लोग खुद माहौल बनाने के लिए हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं।
– फिरहाद हाकिम, तृणमूल नेता व बंगाल के शहरी विकास मंत्री

तृणमूल कांग्रेस डर गई है और हिंसा को बढ़ावा दे रही है।
– राहुल सिन्हा, बंगाल भाजपा नेता

‘राज्य में लोकतंत्र और कानून व व्यवस्था नामक कोई चीज नहीं बची। रोजाना हमारे कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है।’
– मुकुल राय, भाजपा के वरिष्ठ नेता

‘हिंसा में शामिल लोगों को तृणमूल और भाजपा के शीर्ष नेताओं की शह है।’
– कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर चौधरी

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