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एक रिसर्च (Research) में कहा गया है कि मानव निर्मित कृत्रिम प्रकाश (Man-made Artificial Light) को भी प्रदूषण के दूसरे रूपों की तरह ही माना जाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि यह प्राकृतिक दुनिया (natural world) के लिए श्रंखलाबद्ध तरीके से समस्या पैदा कर रहा है. एक्सेटर विश्वविद्यालय (University of Exeter) के जीवविज्ञानियों (biologists) की एक टीम के अनुसार, ग्रह की मानव निर्मित रोशनी (Man made lights) प्रति वर्ष लगभग 2% बढ़ रही है. यह एक बड़ी समस्या है, जिसकी तुलना जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से की जा सकती है.

इस स्टडी से जुड़ा पेपर नेचर इकोलॉजी और इवोल्यूशन (Nature Ecology and Evolution) पत्रिका में प्रकाशित हुआ. इसमे वैज्ञानिकों ने बताया, एक ओर जहां इससे जीवों का हार्मोन स्तर (Hormone levels), प्रजनन चक्र (breeding cycles) और गतिविधि पैटर्न प्रभावित हो रहा है. वहीं यह शिकारी जीवों (predators) के लिए बाधा भी पैदा कर रही है.

बिगड़ रहा है पशु-पक्षियों की नींद का चक्र
वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में इन बुरे प्रभावों का जिक्र भी किया है. जैसे, वसंत ऋतु की शुरुआत में कीटों के जरिए होने वाले पेड़-पौधों के परागण में कमी आती है. लाइटहाउस के चलते समुद्री पक्षी दिशा भटक जाते हैं. और समुद्री कछुए सवेरे का सूरज समझ गलती से चमचमाते होटलों की ओर चले जाते हैं. अपने इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने 126 पेपर्स में बताए प्रभावों का भी अध्ययन किया.सभी जानवरों की प्रजातियां, जिन्हें इस स्टडी में शामिल किया गया था, उनमें वैज्ञानिकों ने मेलाटोनिन के स्तर को कम पाया. यह एक हार्मोन होता है, जो नींद के चक्र को नियंत्रित करता है. जानवरों में ऐसा रात में कृत्रिम प्रकाश की वजह से हुआ.

कुछ जीवों का फायदा लेकिन ज्यादातर के लिए नुकसानदेह
रिसर्च में देखा गया कि कृत्रिम रोशनी से सामान्य और रात्रिचर दोनों ही प्राणियों के व्यवहार में बदलाव देखा गया. बड़े चूहे, जो ज्यादातर रात में शिकार करते हैं, वे कृत्रिम रोशनी के चलते कम समय के लिए ही शिकार कर पाये. जबकि पक्षियों ने सुबह होने से पहले ही चहकना शुरू किया और दिन होने से पहले ही कीड़ों की खोज में निकल गये.

हालांकि सभी जीव-जंतुओं के लिए नतीजे बुरे नहीं थे. वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ प्रजातियों ने रात के प्रकाश से लाभ उठाया. इससे कुछ पौधे तेजी से बढ़े और कुछ प्रजातियों के चमगादड़ों की संख्या बढ़ गई. हालांकि अंतत: वैज्ञानिक इसी नतीजे पर पहुंचे की सभी प्रजातियों पर पड़े संयुक्त प्रभाव पर ध्यान दें तो यह विनाशकारी ही था. खासकर बहुत गर्म बल्बों या तेज गति वाली कार की बत्तियों की ओर खिंचे चले आए कीड़ों के लिए.

LED बल्बों के चलते और बढ़ रही है समस्या
विश्वविद्यालय के पर्यावरण और स्थिरता संस्थान में प्रोफेसर और स्टडी के प्रमुख लेखक केविन गैस्टन ने कहा, “जो बात निकल कर सामने आई है, वह यह है कि ये प्रभाव कितने व्यापक हैं. ये प्रभाव हर जगह पाए गए- रोगाणुओं, अकशेरुकी जीवों, जानवरों और पौधों सभी पर.” उन्होंने कहा कि हमें कृत्रिम प्रकाश के बारे में सोचना शुरू करना होगा.

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उन्होंने कहा कि पिछले 5 से 10 सालों में इस विषय में अध्ययन बढ़े हैं क्योंकि दुनिया में कृत्रिम प्रकाश की मात्रा बढ़ी है. और प्रभाव अधिक स्पष्ट हो गए हैं. उपग्रह से रात में ली गई पृथ्वी की तस्वीरें बताती हैं कि भौगोलिक रूप से यह समस्या कितनी तेजी से बढ़ रही है. क्योंकि महंगे कम रोशनी वाले बल्बों को सस्ते ज्यादा सफेद चमकीली रोशनी देने वाले एलईडी बल्बों से बदला जा है. यह जैविक रूप से बड़ी समस्या है क्योंकि सफेद रोशनी में सूरज की रोशनी की तरह व्यापक स्पेक्ट्रम होता है.





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