भोजपुरी में मकई के जनेरा भी कहल जाला.मोटान्जा माने मोट अनाज मकई के बारे में बचपन में एगो गीत सुनाइल रहे. पता ना भोजपुरिया सरेह में अब ई गीत सुनाला की ना-

मकइया रे तोर गुन गवलो ना जाला.
भात करे फुटुर-फुटुर
लिटी छितराला.मकइया रे तोर गुन गवलो ना जाला

एकर भावार्थ बा कि ए मकई ताहार गुण गावल ना जाता.ताहार भात त फुटुर-फुटुर करेला आ लिटी छितरा जाले. मकई यानी जनेरा अइसन अनाज बा, जेकरा से तरह-तरह के व्यंजन बनावल जाला आ ओकरा के कई तरह से खाइल जाला. भोजपुरी में पढ़ें- महर्षि भृगु के तप:स्थली : लोकमेला ददरी

जइसे ओकर दरिया के भात बनेला.एह भात से मांड ना निकलेला.जब भात पाकेला त ओह में से फुटु-फुटु आवाज निकलेला.दरअसल मकई में स्टार्च खूब होला त ओकर दरिया के बनावत खानी स्टार्च के एगो लेयर बनि जाला.लेकिन गरमी के चलते ओह सतह के नीचे भाप यानी गैस बनेले आ जब ओकर दबाव ढेर बनेला त उ फुटु से बहरि निकलि जाले. एह वजह से मकई के भात बनावत खानी गिहिथिन लोग तसला-बटलोही से तनि दूरिये रहेला लोग. ना त फुटुका में से छिंटिका निकलि के देहियो पर परि सकेला. जवना से छाला पड़े के डर रहेला.

दूध संङ्गे मकई के भात
मकई के गरम भात दूध आ गुर भा चीनी संगें गजबे लागेला.आ इहे भात जब सेरा जाला त माठा आ नून संगे जिभि पर राज करे लागेला. जनेरा के आटा, गहूं भा जौ के आटा नियर लेसदार तरीका से ना साना पावेला.मकई के आटा के कतनो सान.ओह में लेस होखबे ना करेला.त ऊ बिखरि जाला.चूंकि ओकर आटा में हर हाल में टूटे के गुण होला.शायद यही वजह से ओकरा के टूटन कहल जाला.बहरहाल ओकरा एहि गुण के कारण ओकर लिटी भा रोटी बनावे खातिर टूटन में गहूं के तनी आटा जरूर मेरावल जाला.टूटन के लिटी त लोग चोखा, चटनी आ तरकारी संगे खाला.लेकिन दूध, दही भा माठा संगे ओकर जवन स्वाद मिलेला. ओकर बर्णन उहे कइ सकेला. जे ओकरा के चिखले होई.

मकई के देहाती भोजन के तीन गो अउरी रूप बा.
जनेरा के दाना के बालि से निकलला के बाद तनी कचकराहे रहत घोंसारि-भांसारि में तनि कम भुंजवा लिहल जाला.ओकरा के भोजपुरी इलाका में उलावा कहल जाला.ई उलवा घर में छांटि-फटकि के रखि लिहल जाला.ओकर दू गो तरीका से इस्तेमाल होला.  उलवा के दरिया दरि के ओकरा के दही भा दूध संगे मीठा डालि के खाइल जाला.ओकरा के दारा कहल जाला. इहां ध्यान देबे के बा कि मकई के भात होखे भा लिट्टी.ऊ सुपाच्य आ हलुक होला.लेकिन दारा गंभीर आ कई बार गरिष्ठ हो जाला.भोजपुरी इलाका में कहाला कि दारा पेटवा में जा के फूले ला.

भुजल मकई, भुजुना आ लावा माने पॉप कॉर्न

उलवा के बाद में भुजुना भी भुजवा के दाना नियर खाइल जाला.त ओकर सतुआ पिसि के घीव, चीनी भा गुर संगे ढेरे लोग खाला. मकई के भी भुजुना भी दू तरीका के होला.एगो के ठुरी कहल जाला.ठुरी में दाना में लावा ना फुटेला.ओकर स्वाद में सोंधापन होला.केहू ओकरा के गुर संगे खाला त केहू नून-मरीचा संगे.रेलगाड़ी भा बाजार-हाट में ओकर भुजुना के चना के भुजुना संगे पियाजु, मुरई, मरीचा मसाला संगे हिंदुस्तान में शायदे केहू होई जे ना खइले होई.

जनेरा के भुजुना के एगो अउरू रूप बा.ओकरा में दाना भुंजात खानी फूली जाला.जवना के देहाति में लावा कहल जाला त शहरी लोग अंग्रेजी में ओकरा के पॉप कार्न कहेला लोग.महानगरन के सिनेमा हाल में त इंटरवल के ई सबसे प्रचलित नाश्ता बा. सामान्य दिन में मकई के दाना के भूनि के ओकर सतुआ पिसवा के चना के सातू संगे मिला के नमक-मिर्चा, पियाजु, मुरई, चटनी. चोखा संगे गरमी के दिन में खूब खाइल जाला.

शहर में नाश्ता में प्रयोग
शहरी लोग जनेरा के खास रूप में आपना नाश्ता के अंग बना लेले बा.शहरन में आजु शायदे कवनो घर होई.जहां कार्न फ्लेक्स ना खाइल जात होई.केहू दूध संगे खाला त केहू दही संगे त केहू दूध आ फल संगे.
बालि यानी भुट्टा के सेंकि के शहर होखे भा देहाति.हर जगह खाइल जाला.शहर में त कार्न यानी दुधारि बालि के दाना के स्वीट कार्न सूप बनावल जा रहल बा.पिज्जा, बर्गर से लेके तरकारी तक में इस्तेमाल हो रहल बा.आ एकरा के बहुते पौष्टिक मानल जाता.ओइसे ई पौष्टिक होखबो करेला.

सही में देखिं त भोजपुरी इलाका में कार्न फ्लेक्स के देहाती रूप बा चिउरी.कार्न फ्लेक्स में मकई के दाना के उबाल कि ओकर कुटाई कइके ओकरा के चिपुट बना दियाला. त भोजपुरी इलाका में कचकराह मकई के दाना के भूनि के ओकरा के ओखरि में कूटि दियात रहल हा. मकई में कार्बोहाइड्रेट आ रफेज यानी रेशा खूब होला.एह वजह से मकई खूब पौष्टिक होला आ कब्ज आदि में रामबाण नियर काम करेला.

आधुनिक चिकित्सा आ भोजन विज्ञान एह घरी मकई के सेहत खातिर बेहतर बतावता त ओकर शहर में मांग बढ़ि गइल बा.बाकिर देहाति में एक जमाना में ओकरा घरे लोग आपन बेटी बियाहे से परहेज करत रहल हा.जेकरा घरे चाउर के भात के बजाय मकई के भात, आटा के रोटी के बजाय टूटन के लिटी ढेरे पाकत रहल हा.

पौराणिक कहानी
जनेरा के मोट अनाज मानल जात रहल हा.आ मोट अनाज खाये वाला परिवार पिछड़ा.एकर शायद ई वजह रहल बा कि पौराणिक मान्यता के मोताबिक ई मुख्य अनाज ना ह.कहल जाला कि भगवान धान, गहूं, जौ, चना जइसन दू-चारिए गो अनाज बनवले रहले.लेकिन जब विश्वामित्र राजपाट त्यागि के तप कइले आ ऋषि बनले त अपना तप से मोट अनाज के रचना कइले.जवना में से एगो जनेरो ह. भोजपुरी इलाका में ओइसे त मकई दू बेर होला.एगो खरीफ वाला.यानी बारिश के दिन में आ दूसर जायद वाला यानी गरमी के दिन में.लेकिन खाए में इस्तेमाल खरीफ वाला के ज्यादा होला.गरमी वाला के इस्तेमाल गाय-गोरू के खियावे में ढेर प्रयोग होला.

अमरिका में होला सबसे ढेर पैदावार
अमेरिका दुनिया के सबसे ज्यादा मकई के उत्पादन करेला. अमेरिका के बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक के साहित्य में जनेरा से बने वाली स्थानीय मिठाई आ डिश के बहुते वर्णन बा. भारत में ओइसे त मकई हर जगह होला.लेकिन बिहार के मुंगेर आ खगड़िया इलाका में सबसे ज्यादा मकई के उत्पादन होला. जनेरा अइसन अनाज बा. जवना के खाए खातिर किसिम-किसिम से इस्तेमाल कइल जाला. आबादी के एगो बड़ हिस्सा के पेट भरे के आजुओ मकई बड़ साधन बा. चूंकि आज दुनिया एक बेरि फेरू हेल्थ कांसस यानी सेहत के लेके सचेत होत जात बिया.एह वजह से अब देहाति होखे भा शहर. जनेरा खाइल अब पिछड़ापन के बजाय सेहत के निशानी बनि गइल बा.





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