कोवैक्सिन के डेवलपमेंट में अहम रहे डॉ. कृष्ण एला और डॉ. सुमति.


भारत में Covid-19 के खिलाफ लड़ाई में निर्णायक मोड़ वैक्सीन को मंज़ूरी मिलना माना जा रहा है. भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल (DGCI) से भारत निर्मित दो वैक्सीनों को मंज़ूरी मिलने के बाद यह फैक्ट भी दिलचस्प है कि इन दो में से एक वैक्सीन तो भारत में ही भारतीय वैज्ञानिकों ने डेवलप की है. ट्रायल में जिसके नतीजे काफी सकारात्मक दिखे. भारत बायोटेक कंपनी ने जो वैक्सीन डेवलप की है, उसके पीछे विज़न और मेंटरिंग के लिए देश के दो बेहतरीन वैज्ञानिकों डॉ. कृष्ण एला और डॉ. सुमति के की भूमिका रही है.

मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में रिसर्च वैज्ञानिक रहे डॉ. एला ने ही भारत बायोटेक की स्थापना की थी और कोविड 19 के खिलाफ पहली भारतीय वैक्सीन के पीछे यही कंपनी है. विस्कॉन्सिन मेडिसन और मनोआ स्थित हवाई यूनिवर्सिटी में शिक्षा लेने वाले डॉ. एला के बारे में आपको आगे बताते हैं क्योंकि ‘लेडी’ज़ फर्स्ट’ के हिसाब से डॉ. सुमति की चर्चा पहले ज़रूरी है.

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कोवैक्सिन में सुमति की भूमिका
कोविड वैक्सीन के डेवलपमेंट के लिए भारत बायोटेक की जो कोर टीम बनाई गई थी, उसका प्रमुख हिस्सा रहीं डॉ. सुमति के ने खास भूमिका निभाई. पहले ज़ीका और चिकनगुनिया के लिए भी वैक्सीन बनाने के मिशन में कामयाब रह चुकीं डॉ. सुमति जेएनयू से लाइफ साइंसेज़ में पीएचडी हासिल कर चुकी हैं और लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज व IISc बेंगलुरु से कॉमनवेल्थ स्कॉलरशिप भी पा चुकी हैं.

किसान के बेटे ने रचा इतिहास
डॉ. कृष्ण एला विस्कॉन्सिन मेडिसन यूनिवर्सिटी और मनोआ स्थित हवाई यूनिवर्सिटी में शिक्षा लेने के साथ ही दक्षिण कैलिफोर्निया की मेडिकल यूनिवर्सिटी में काम भी कर चुके हैं. 1996 में एला ने अपनी कंपनी शुरू की थी, जिसमें अब हज़ारों कर्मचारी काम करते हैं. कोवैक्सिन से पहले उनकी कंपनी भारत बायोटेक चिकनगुनिया, जीका, रोटावायरस, रैबीज़, जापानी इंसेफलाइटिस और H1N1 के खिलाफ भी वैक्सीन बना चुकी है.

भारत बायोटेक के डॉ. एला ने वैक्सीन को मंज़ूरी मिलने पर इसे भारतीय वैज्ञानिकों के लिए गर्व की बात बताया था.

एला की कंपनी की टीम ने ही दुनिया में पहली बार टायफॉइड के लिए टेटेनस टॉक्साइड युग्म की वैक्सीन डेवलप की थी. एक तमिल किसान परिवार में जन्मे एला को अब तक 100 से ज़्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के अवॉर्ड्स से नवाज़ा जा चुका है. केंद्रीय कैबिनेट की वैज्ञानिक सलाहकार समिति में एला शामिल हैं. इसके अलावा विज्ञान और तकनीक से जुड़ी कई कमेटियों में एला सदस्य हैं. बायोवेट और इनोवा फूड पार्क के संस्थापक भी एला ही हैं.

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कोवैक्सिन डेवलपमेंट टीम में और कौन रहा?
डॉ. एला और डॉ. सुमति के अलावा कोरोना वैक्सीन डेवलपमेंट करने वाली टीम में डॉ. एला के बेटे डॉ. रैचेज़ ने भी अहम भूमिका ​अदा की. रैचेज कोवैक्सिन की सेफ्टी और प्रतिरोधी क्षमता पर रिसर्च पेपर भी लिख चुके हैं. पहले कुछ वैक्सीनों के लिए डेटा एनालिसिस और सहयोगी तैयारियां करने वाले रैचेज़ भारत बायोटेक में वैक्सीन के प्रोजेक्ट लीड होने के साथ ही बिज़नेस डेवलपमेंट के प्रमुख भी हैं.

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रैचेज़ जॉन हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल में लोक स्वास्थ्य विभाग में पीडी फेलो हैं. भारत बायोटेक की बायो कंटेनमेंट फैसिलिटी में कोवैक्सिन का डेवलपमेंट किया गया. 140 ग्लोबल पेटेंट अपने नाम रखने वाली यह कंपनी 16 वैक्सीनों को अपने प्रोडक्ट के तौर पर शुमार करती है.

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कोवैक्सिन की कहानी के फैक्ट्स ये भी
वायरोलॉजी के नेशनल इंस्टीट्यूट के साथ ही देश की शीर्ष मेडिकल संस्था आईसीएमआर कोवैक्सिन के डेवलपमेंट और उत्पादन में साझेदार रहे हैं. जुलाई 2020 में इस वैक्सीन को देश भर में ट्रायल के लिए मंज़ूरी मिली थी. देश के 25 सेंटरों पर करीब 26,000 लोगों पर इस वैक्सीन का अंतिम ट्रायल किया गया. इस वैक्सीन की मंज़ूरी के बाद डॉ. एला ने कहा था कि उनकी कंपनी इसे दुनिया भर में मुहैया कराने का इरादा रखती है.





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