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फ्रांस (France) ने यूरोपीय साथी देश ग्रीस के साथ एक डील (France-Greece Rafale Deal) की खबर है, जिसके तहत फ्रांस 18 लड़ाकू विमान राफेल ग्रीस को मुहैया कराएगा. इसमें खास बात यह है कि पहला राफेल ग्रीस को एक साल के भीतर मिल जाएगा. अब सवाल यह खड़ा होता है कि फ्रांस ऐसा पक्षपात क्यों कर रहा है? भारत ने 36 राफेल के लिए फ्रांस के साथ डील (India France Rafale Deal) की थी, यानी भारत बड़ा ग्राहक है तो उसे प्राथमिकता मिलना चाहिए थी, लेकिन भारत को तो पहला राफेल देने में फ्रांस ने 8 साल लगा दिए?

खबरों की मानें तो ग्रीस के सूचना पत्र पेंटापोस्टैगमा के मुताबिक यूनानी वायु सेना (HAF) को फ्रांस से 12 सेकंड हैंड और छह नए राफेल मिलने की डील हुई. हालांकि ये सेकंड हैंड कितने पुराने होंगे, इस बारे में स्पष्टता नहीं है, लेकिन यह खास है कि जैसे ही दस्तावेज़ी औपचारिकता हो जाएगी, उसके छह महीने में पहला राफेल ग्रीस को मिल जाएगा. इस डील से जुड़े कुछ बिंदु अहम हैं जैसे भारत को जल्दी राफेल क्यों नहीं मिला और ग्रीस को क्यों मिल रहा है.

ग्रीस को इतनी प्राथमिकता क्यों?कुछ हफ्ते पहले ही यह डील हुई है और कहा गया है कि इस साल के आखिर तक तमाम कागज़ात तैयार कर लिये जाएंगे. अगर सब कुछ ठीक रहा तो 2021 जून तक पहला राफेल ग्रीस की ज़मीन पर उतर सकता है. अस्ल में, ग्रीस राफेल के लिए जल्दबाज़ी में है क्योंकि पड़ोसी देश तुर्की के साथ वह युद्ध की कगार पर है. कभी भी जंग छिड़ सकती है, इसी के मद्देनज़र फ्रांस अपने साथी यूरोपीय देश को प्राथमिकता देने पर राज़ी भी हुआ है.

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समुद्री सीमा को लेकर ग्रीस और तुर्की​​ भिड़े हुए हैं.

ग्रीस और तुर्की के बीच बढ़ रहे तनाव के चलते ही आनन फानन में यह डील हुई है, जिसमें ग्रीस ने दासॉ के 18 फाइटर जेट के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत उसके आधा दर्जन फाइटर पायलट फ्रांस जाएंगे और ट्रेनिंग लेंगे. इसके बाद, ग्रीस के फाइटिंग फैल्कनों, मिराज और डगलस फैंटम जैसे जंगी बेड़े में राफेल भी शामिल हो जाएगा.

ग्रीस और तुर्की के बीच तनाव क्यों है?
पिछले साल तुर्की ने लीबिया के साथ समुद्री सीमा के साथ एक डील करते हुए नया नक्शा पास कर दिया था, लेकिन इसमें ग्रीस के दावे वाला भी एक हिस्सा तुर्की ने अपना बताया. अब दोनों देश उस हिस्से और सीमा को लेकर भिड़ रहे हैं, जिस पर दोनों दावा करते हैं. इस साल अगस्त में तब तनाव पैदा हुआ, जब तुर्की ने एक सर्वे जहाज़ कुछ युद्धपोतों के साथ इस हिस्से में तैनात कर दिया.

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​बीते 25 अगस्त को ये खबरें भी आई थीं कि ग्रीस और तुर्की दोनों एक दूसरे के खिलाफ नौसैनिक अभ्यास करने जा रहे थे. इससे तनाव और बढ़ा और तेल के ट्रांसपोर्ट के लिहाज़ से काफी अहमियत वाली इस समुद्री सीमा को लेकर दोनों देश युद्ध के मुहाने पर पहुंच चुके हैं. तो आप समझ सकते हैं कि ग्रीस को राफेल के लिए जल्दबाज़ी क्यों है.

भारत के लिए राफेल डील
अब रही बात, भारत की तो 2008 में भारत ने जंगी विमानों के लिए विचार शुरू किया था. बोइंग, राफेल, टायफून, एफ 21, मिग 35 और जेएएस 39 ग्रिपेन के विकल्पों से गुज़रते हुए राफेल की तरफ भारत का झुकाव 2012 में हुआ. 2012 से राफेल डील काफी धीमी रफ्तार से चली. 2015 में जाकर 36 राफेल जेट के लिए डील फाइनल हुई. 2016 में 7.87 अरब यूरो यानी करीब 60 हज़ार करोड़ रुपये की डील पर दस्तखत हो गए.

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अब यहां से भी मानें, तो 2017 तक भारत को पहला राफेल मिल सकता था. लेकिन राफेल की पहली खेप इसी साल करीब दो महीने पहले भारत तब पहुंची, जब चीन के साथ सीमा पर तनाव की स्थिति से भारत जूझ रहा था. राफेल का अगला बैच भारत को इस साल नवंबर तक मिलने की उम्मीद है. इसके बाद हर दो तीन महीने में राफेल भारत पहुंचते रहेंगे और भारतीय वायु सेना की मानें तो पूरे 36 विमान 2023 तक ऑपरेशन में आ जाएंगे.

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भारत को देर से क्यों मिले राफेल?
ग्रीस के साथ तुलना को लेकर विशेषज्ञों ने कुछ सवाल खड़े किए हैं. ये सवाल अधिग्रहण प्रक्रिया को लेकर हैं. भारत में राफेल के लिए 2012 से ही प्रक्रिया पहले तो बहुत धीमी गति से आगे बढ़ी. इसके बाद, डील फाइनल होने पर भारत में ही यह डील विवादों में घिर गई. पिछले साल संसद में रखी गई सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि भारतीय वायु सेना शुरू से ही राफेल खरीदी के लिए हिचक दिखा रही थी.

बहरहाल, पिछले दो सालों से कई बार खबरों में राफेल के भारत आने की अलग अलग तारीखें बताई गई थीं, लेकिन कुछ भारत तो कुछ फ्रांस की तरफ से लेटलतीफी चलती रही और आखिरकार पहली खेप इस साल भारत पहुंच सकी.





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