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चीन की कारोबारी नीतियां (Trade Policy) फरेब और चालबाज़ियां हैं, चीन की सरकार (China Government) कपटी है और उसने वैश्विक महामारी (Covid-19 Pandemic) के बारे में समय पर सही जानकारी नही दी, चीन की टेक कंपनियां छलावे में माहिर हैं, चीन एक तरफ हांगकांग (Hong Kong) में लोकतंत्र की आवाज़ को कुचलता है तो दूसरी तरफ झिनझियांग में अल्पसंख्यकों की पूरी नस्ल का सफाया करने पर तुला है… पिछले चार सालों से अमेरिका का फेवरेट विलेन चीन (US Allegations on China) बना हुआ है और इस तरह के आरोप आप पिछले कुछ सालों में सुनते रहे हैं.

पिछले चार सालों के दौरान खास बात यह हुई है कि अमेरिका की टक्कर में चीन दूसरी महाशक्ति बनकर खड़ा हो गया है. एक तरह से यह दुनिया की ताकत का ध्रुवीकरण रहा है. अमेरिका और चीन के बीच दूरियां लगातार बढ़ने के लिए अमेरिका में एक बड़ा वर्ग है, जो मानता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय में व्हाइट हाउस की नीतियां इस तरह की रहीं कि चीन खुलकर बड़े दुश्मन के तौर पर उभरा. अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान यह विषय काफी महत्व का हो गया है.

दूसरी तरफ, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के समय में चीन बेहद आक्रामक ढंग से विस्तारवादी, दमनकारी और कूटनीतिक स्तर पर ‘चाइना फर्स्ट’ नीतियों को हामी बनकर उभरा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक तरफ, चीन ने अपना लोहा मनवाया है तो दूसरी तरफ, कई बड़ी ताकतों के साथ दुश्मनी भी मोल ली है. अब दो प्रमुख दावेदारों ट्रंप और जो बिडेन में से कौन नया राष्ट्रपति होगा, यह चीन के लिहाज़ से काफी अहम हो जाता है. कैसे? जानिए.

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बिडेन या ट्रंप? चीन किसे अगला अमेरिकी राष्ट्रपति देखना चाहेगा?

ट्रंप और चीन : समस्या या नफरत?
साल 2016 से ही ट्रंप ने चीन के साथ जो ट्रेड वॉर छेड़ा, तो वो अभी तक पटरी पर नहीं लौटा बल्कि रिश्ते और हालात बद से बदतर ही होते चले गए. अपने चुनावी अभियानों के दौरान ट्रंप ने साफ तौर पर यही ढोल पीटा है कि अगर वो फिर राष्ट्रपति बने, तो कारोबारी मोर्चे पर चीन के​ खिलाफ और सख्त रवैया अपनाने वाले हैं. सिर्फ व्यापार ही नही बल्कि तनाव के और मोर्चे भी हैं.

विचारधारा : ट्रंप और उनके प्रशासन प्रमुख माइक पोम्पियो कई बार मंचों से कह चुके हैं कि चीन इस समय में दुनिया के कई देशों का प्रमुख दुश्मन है क्योंकि वह ‘मार्क्सवादी विचारधारा’ का कट्टर समर्थक है. ट्रंप ने कई यूरोपीय देशों को चीनी टेक हुआवे को सीमित रखने के लिए भी दबाव बनाया.

छल कपट : कोरोना वायरस आउटब्रेक चीन के वुहान में सबसे पहले पिछले साल दिसंबर में हुआ था. इसके अगले दो महीने बाद यह महामारी की शक्ल इख्तियार कर ​गया, तो ट्रंप प्रशासन ने इसे ‘चीनी’ या ‘वुहान वायरस’ कहकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर चीन को इसके लिए दोषी करार दिया. हालांकि चीन इस आरोप से इनकार करता रहा.

एटिट्यूड : ट्रंप प्रशासन ने इस बात को कई बार दोहराया कि चीन समाधान नहीं चाहता. चीन का नज़रिया और वो वास्तव में चाहता क्या है, समझना मुश्किल हो जाता है क्योंकि चीन किसी नीति नहीं बल्कि अपने अक्खड़ रवैये से चलना चाहता है. और इस तरह की चीनी नीति अमेरिकी सुरक्षा के लिए सीधे खतरा बनती है.

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महामारी के मुद्दे पर चीन को घेरने में अमेरिका ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

बिडेन और चीन : संभावना या सख्ती?
पूर्व उपराष्ट्रपति रह चुके जो बिडेन ने अपने चुनावी प्रचार के दौरान इस बात पर ज़ोर दिया कि वो अगर व्हाइट हाउस में पहुंचते हैं तो कम्युनिस्ट चीन को विश्व अर्थव्यवस्था में सहयोगी हिस्सेदार बनाने की तरफ ध्यान देंगे. बिडेन के मुताबिक अमेरिकी नीतियों के कारण ही अमेरिका उत्पादन और निर्माण के मामले में बेहद पिछड़ चुका है इसलिए इस क्षेत्र की शक्तियों के साथ उसके रिश्ते बिगड़ रहे हैं. लेकिन बिडेन को लेकर अमेरिका में कई तरह की बातें हो रही हैं.

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बिडेन प्रशासन के बारे में चर्चा है कि वो चीन के खिलाफ और सख्त रवैया अपनाने में भी गुरेज़ नहीं करेगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि बिडेन को भी मन ही मन पता है कि ट्रंप ने चीन को ठीक से समझने में भूल नहीं की है. दूसरी तरफ, खुद बिडेन कह चुके हैं कि मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के मोर्चे पर वो कड़ा रुख अख्तियार करेंगे. अब सवाल ये है कि चीन कैसे इन दो दावेदारों को देख रहा है?

किसके राष्ट्रपति बनने से क्या होगा?
एक ताज़ा बयान में अमेरिकी इंटेलिजेंस ने कहा कि चीन चाहता है कि ट्रंप चुनाव हार जाएं. यही बात खुद ट्रंप भी कह चुके हैं. यही नहीं, चीन अमेरिकी चुनाव प्रचार के दौरान कई बार ट्रंप के खिलाफ बयानबाज़ी कर चुका है. दूसरी तरफ, चीन में कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि बिडेन के राष्ट्रपति बनने से चीन को ज़्यादा जोखिम हो सकता है. ‘ट्रंप सहयोगी देशों के साथ संबंध बिगाड़ चुके हैं इसलिए बिडेन संभव है कि इन देशों को साथ लें और चीन के खिलाफ बड़े स्तर पर एक्शन लें.’

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न्यूज़18 क्रिएटिव

यह बात एक पूर्व चीनी ट्रेड निगोशिएटर के हवाले से कही गई थी. बीजिंग की एक यूनिवर्सिटी में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ प्रोफेसर के हवाले से कहा गया कि बिडेन चीन के खिलाफ सख्त रवैया और असरदार ढंग से उठाने वाले राष्ट्रपति साबित हो सकते हैं. वो शायद और स्पष्ट और सुनियोजित ढंग से चीन का विरोध करें. ‘बेल्ट एंड रोड : ए चाइनीज़ वर्ल्ड ऑर्डर’ किताब के लेखक ब्रूनो मैकेयस की मानें तो बिडेन या ट्रंप, कोई भी राष्ट्रपति बने, संघर्ष और बढ़ना ही है.

मैकेयस की मानें तो चीन सिर्फ अमेरिका ही नहीं, दुनिया में कई जगह अपनी छवि बर्बाद कर चुका है. यही बात प्यू रिसर्च सेंटर ने इस तरह कही है कि कोरोना वायरस संकट के लिए नहीं, बल्कि अपनी दादागिरी और गुंडागर्दी वाली हरकतों के चलते चीन को कई देश जितना नापसंद अब कर रहे हैं, उतना इतिहास में कभी नहीं हुआ.





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