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अमेरिका में सत्ता परिवर्तन होता है, तो उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है. डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के हारने के बाद डेमोक्रेट नेता जो बाइडन (Joe Biden) अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे और भारतीय मूल की कमला हैरिस उपराष्ट्रपति, तो खास तौर से कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका के रुख (US Position on Kashmir) में क्या कोई बदलाव होगा? क्या भारत में एनडीए सरकार (NDA Government) के लिए कश्मीर के लिहाज़ से अमेरिका में सत्ता परिवर्तन बेहतर साबित होगा या ट्रंप के जाने से कुछ नुकसान होगा? फिलहाल, बाइडन और हैरिस के सत्ता में आने पर भारत की तरफ से मिश्रित प्रतिक्रिया देखी गई.

एक तरफ ये कहा जा रहा है कि हैरिस चूंकि भारतवंशी हैं इसलिए भारत की तरफ उनका खास रुझान स्वाभाविक होगा. इस कारण से पाकिस्तान के खिलाफ भारत को अमेरिका का साथ बेहतर मिल सकेगा. दूसरी ओर, यह भी थ्योरी है कि अमेरिका की राजनीति में कश्मीर मुद्दा मानवाधिकारों के साथ सीधे तौर पर जुड़ा है इसलिए अमेरिका भी इस दिशा में फूंक फूंक कर ही कदम रखेगा. आइए समझते हैं कि ये पूरा माजरा क्या है.

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कश्मीर पर ट्रंप बनाम बाइडनचार साल पहले ट्रंप जब सत्ता में आए थे, तब उन्होंने पूरे जोशो खरोश से खुद को ‘हिंदुत्व का फैन’ बताया था. असर यह हुआ कि भाजपा सरकार ट्रंप की तरफदार होती चली गई. प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप ने एक दूसरे के लिए अंतर्राष्ट्रीय आयोजन करवाए. इसके बाद दो घटनाएं हुईं. एक, ट्रंप ने कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की और दूसरी तरफ, कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन व नागरिकता कानून को लेकर अमेरिका ने एक रणनीतिक चुप्पी साधे रखी. यानी भारत का साथ नहीं दिया.

बाइडन और हैरिस चुनाव अभियान में ‘प्रो मुस्लिम’ रुख ज़ाहिर कर चुके हैं.

वहीं, बाइडन और हैरिस के चुनावी अभियान के दौरान कश्मीर मामले में एक अलग सुर सुनाई दिया. आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद हैरिस ने कहा था ‘कश्मीरी खुद को अकेला न समझें. पूरी नज़र रखी जा रही है और समय आने पर हस्तक्षेप भी किया जाएगा.’ ये भी गौरतलब है कि अमेरिका चुनाव के दौरान मुस्लिम अमेरिकियों के लिहाज़ से तैयार बाइडन के कैंपेन के एजेंडे में भारत में एनआरसी और कश्मीर को दुनिया की मुस्लिम आबादी के लिए खतरे की लिस्ट में रखा गया.

कश्मीर में भारत सरकार को कश्मीरियत और कश्मीरी लोगों के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए तमाम ज़रूरी कदम उठाने चाहिए. असंतोष पर प्रतिबंध लगाने, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को रोक देने और इंटरनेट बंद कर देने जैसे कदमों से लोकतंत्र कमज़ोर होता है.

बाइडन के चुनावी एजेंडे में उल्लेख

क्या है कश्मीर का विचार?
1990 के दशक से ही यह बात एक किंवदंती बन चुकी थी कि कश्मीर घाटी में रोज़ होने वाली हिंसा पर अमेरिका नियमित रूप से नज़र रखता है. कश्मीर में आतंकवाद के चरम के दौरान यह धारणा भी साफ थी कि ताकत का एक ‘मरकज़’ यानी केंद्र दिल्ली में है तो दूसरा मरकज़ इस्लामाबाद में है, लेकिन इनसे भी बड़ा मरकज़ अमेरिका में है. हालांकि पिछले कुछ समय में अमेरिका का दखल कश्मीर घाटी में कम दिखा है.

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अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद कश्मीर की कुछ सियासी इकाइयों की तरफ से ऐसा भी सुनाई दिया कि अमेरिका में ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ खत्म हुई और कश्मीर में जो गलतियां हुई हैं, उन पर बाइडन हैरिस सरकार फोकस करेगी. हालांकि 2019 में कश्मीर राज्य को लेकर जो फैसले हुए, उसके बाद दुनिया भर ने जिस तरह से चुप्पी साधे रखी, कश्मीर मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक, उससे कश्मीरी पूरी तरह निराश हो चुके हैं और उन्हें अब किसी से खास उम्मीद नहीं है.

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विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रंप की तरह बाइडन भारत सरकार को ‘पॉलिटिकल कवर’ देने से परहेज़ करेंगे.

क्या होगा अमेरिका का रुख?
एक संतुलन दिख सकता है. जैसा कि ट्रंप के समय में हुआ कि भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति चुप्पी साधे रहे, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस ने कश्मीर मामले पर जवाब तलब किए. इसी तरह का एक संतुलन सत्ता परिवर्तन के बाद भी बने रहने की संभावना है. इस संतुलन के मायने समझने से पहले अमेरिका की प्रमुख मजबूरियों या नीतियों को ध्यान में रखना चाहिए.

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1. दक्षिण एशिया में चीन के खिलाफ अमेरिका को अपनी रणनीति तैयार करना है. चूंकि ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका और चीन के बीच रिश्ते युद्ध की कगार तक पहुंच चुके हैं इसलिए बाइडन सरकार के सामने चीन को लेकर बड़ी चुनौती होगी कि वो किस तरह ट्रेड वॉर खत्म करके दक्षिण एशिया में अमेरिकी वर्चस्व बनाते हैं.
2. भारत का बाज़ार अमेरिका के लिए काफी अहम है इसलिए भारत को पूरी तरह से दरकिनार करना अमेरिका के लिए संभव नहीं है. साथ ही, चीन के खिलाफ भारत का साथ अमेरिका के लिए काफी अहम है.

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राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि अमेरिका संतुलन की नीति के तहत कश्मीर में सिर्फ मानवाधिकारों को लेकर ही फोकस करेगा, न कि कश्मीर के राजनीतिक माहौल पर. यानी बाइडन के ‘प्रो मुस्लिम’ एजेंडे पर भारत के संदर्भ में कोई खास एक्शन नहीं होगा. इस बारे में स्क्रोल के लेख के मुताबिक यह भी माना जा रहा है कि ट्रंप की तरह बाइडन भारत को ‘​अतिरिक्त कवर’ नहीं देंगे लेकिन भारत के विरोध से भी बचेंगे.





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