Wednesday, April 14, 2021
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जुनून ने बदला जिंदगी: टीवी पर देख ठाना, परिवार से झगड़ा कर जालंधर गया; अब किसान का बेटा बना जिले का पहला रेसलर


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हनुमानगढ़4 घंटे पहलेलेखक: मनोज पुरोहित

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  • आज मिलिए नोहर तहसील के गांव किंकराळी के युवा राहुल चौधरी से, जो एचडब्ल्यूई से खेल रहे, दिल्ली में 20 मार्च को टैग मैच में हासिल की सफलता
  • जब खली ने कद-काठी देखकर कहा- तुम इस गेम में नहीं आ सकते, फिर फुर्ती देख शामिल किया, उन्हीं के ट्रेनिंग सेंटर में तीन साल सीखी रेसलिंग की टेक्नीक

टीवी पर रेसलिंग देखकर एक छोटे से गांव के युवा की रुचि ऐसी जागी कि वह अब खुद प्रोफेशनल रेसलर बन गया है। बड़ी बात ये है कि जिले में यह एक मात्र खिलाड़ी है जो इस क्षेत्र में उपलब्धि हासिल कर रहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं जिले के पहले रेसलर राहुल चौधरी की जो रिंग में ऐसी फुर्ती दिखाता है कि बड़े-बड़े रेसलर इनके सामने घुटने टेक देते हैं।

जिले की नोहर तहसील के गांव किंकराळी निवासी राहुल चौधरी ने महज 23 साल की उम्र में ही रेसलिंग में राष्ट्र स्तर तक पहचान कायम की है। इस किसान के बेटे ने हाल ही में 20 मार्च को दिल्ली में हुए टैग मैच में सफलता पाई वहीं इससे पहले 20 फरवरी को बिहार में हुए मैच में भोपाल के रेसलर आवेश को चुनौती देकर जीत अपने नाम की थी।

राहुल ने बताया कि जब उन्होंने रेसलर बनने की ठानी तो वह ट्रेनिंग लेने जालंधर स्थित सीडब्ल्यूई द ग्रेट खली के नाम से ट्रेनिंग सेंटर है वहां गए। हालांकि शुरुआत में खली ने राहुल की कद-काठी देखकर उन्हें मना किया लेकिन बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद जब उसकी फुर्ती देखी तो ट्रेनिंग देने के लिए राजी हो गए। राहुल ने तीन साल तक ट्रेनिंग ली और हर दांव-पेंच सीखा। आज वह रिंग के अंदर खिलाड़ियों के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। राहुल अब (एचडब्ल्यूई) हिंदुस्तान रेसलिंग इंटरटेनमेंट से जुड़े हैं और हर दिन मैचों में रेसलरों को पछाड़ते हैं। राहुल ने बताया कि टीवी में आने वाली रेसलिंग ने मुझे हमेशा प्रभावित किया। इसके बाद मैंने यू-ट्यूब के जरिए एकेडमी की तलाश की फिर 2018 में इससे जुड़ा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

जुनून ऐसा था कि परिजनों ने साफ मना कर दिया लेकिन फिर भी यही फील्ड चुनी
राहुल ने बताया कि जब मैंने रेसलर बनने की इच्छा पिता विजय सिंह गोदारा और माता राजबाला से जाहिर की तो उन्होंने साफ मना कर दिया, कहा- हम किसान परिवार से हैं। इस तरह मारने पीटने वाले खेल से हमारा भला क्या वास्ता लेकिन परिवार से लड़-झगड़ कर मैंने इस फील्ड काे चुना। रेसलिंग का जुनून ऐसा था कि बीएससी सेकंड ईयर में पढ़ाई तक छोड़ दी और दिन-रात प्रैक्टिस की। अब परिजन भी राहुल पर गर्व करते हैं। यही नहीं पिता ने उधार लेकर ट्रेनिंग के लिए रुपए जुटाए थे। हर माह 40 हजार रुपए का खर्च आता था लेकिन पिता ने मेरे सपनों को साकार किया।

सपनों के पीछे भागना जरूरी डब्ल्यूडब्ल्यूई में सिलेक्ट होकर देश का नाम रोशन करना है
राहुल का मानना है कि हर किसी को अपने सपनों को पूरा करने का लक्ष्य बना लेना चाहिए। इसके बाद कोई भी काम मुश्किल नहीं लगता। उन्होंने बताया कि बहुत से ऐसे युवा हैं जो इस फील्ड में जाना चाहते हैं लेकिन जा नहीं पाते।

ऐसे युवाओं को मथुरा में एडब्ल्यूई ज्वाइन करना चाहिए। अपनी हेल्थ का ध्यान रखें। खाना-पीना अच्छा हो, नशे से दूर रहो। रोजाना कसरत कर पूरी शिद्दत से ट्रेनिंग करे तो कोई भी रेसलर बन सकता है। राहुल ने बताया कि डब्ल्यूडब्ल्यूई में सिलेक्ट होकर देश के लिए खेलना चाहते हैं। इसके लिए वे कड़ी मेहनत कर रहे हैं। रेसलिंग में राहुल सुपर किक, पंच, स्पीयर, आरकेओ आदि में पारंगत हो चुके हैं।

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