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अमेरिका में लोकतंत्र और चुनावों का इतिहास 225 सालों से ज्यादा पुराना है. पहली बार वहां 1788 में जार्ज वाशिंगटन राष्ट्रपति चुने गए थे लेकिन आज तक अमेरिका में चुनावों को हारने के बाद किसी प्रेसीडेंट ने ऐसा व्यवहार नहीं किया. ना तो ट्रंप ने अभी तक हार मानी है बल्कि ऐसा लग रहा है कि सत्ता पर बरकरार रहने के लिए वो तमाम जुगत करने में लगे हैं.

अब तक अमेरिका में एक राष्ट्रपति से दूसरे राष्ट्रपति को सत्ता का हस्तांतरण बहुत सहजता से होता आया है. इसमें कोई दिक्कत नहीं हुई है. चुनाव हारने वाला अमेरिकी राष्ट्रपति कोई बड़ा फैसला तब तक नहीं करता जब तक नया राष्ट्रपति खुद सत्ता को नहीं संभाल ले. अगर कुछ ऐसा करने की जरूरत पड़ भी गई तो वो नए राष्ट्रपति से सलाह मश्विरा जरूर करता रहा है लेकिन ट्रंप एकदम अलग तरह से व्यवहार कर रहे हैं.

पेंटागन में उन्होंने जिस तरह से बड़े पैमाने पर बदलाव किया, उसे हैरत से तो देखा ही जा रहा है और ये भी माना जा रहा है कि वो सत्ता का हस्तांतरण आसानी से नहीं होने देंगे. ये तब है कि जबकि जो बाइडन ने अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनावों में इतने वोट हासिल किए हैं, जो अमेरिकी इतिहास में सबसे ज्यादा माने जा रहे हैं, इसके बाद भी ट्रंप ने अब तक ना तो हार मानी है और ना ही सत्ता के शांतिपूर्ण ट्रांसफर की ओर बढ़ते दिखते हैं.

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निश्चित तौर पर अमेरिका में कई बार चुनावों के दौरान बहुत कटु माहौल बना है. कई बार चुनावी लड़ाई बहुत नजदीक रही है लेकिन ये हालत कभी नहीं दिखी. वर्ष 2000 में डेमोक्रेटिक पार्टी के अल गोर और रिपब्लिकन जार्ज डब्ल्यू बुश के बीच चुनाव था.

डेमोक्रेटिक प्रत्याशी जो बाइडन भारी मतों से जीते हैं लेकिन इसके बाद भी डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक अपनी हार स्वीकार नहीं की है. (न्यूज 18 क्रिएटिव)

गोर ने चुनाव की रात के बाद सुबह जल्दी बुश से कहा कि वो अपनी हार स्वीकार कर लें. इसके बाद भी दिन भर दोनों में तीखी तकरार होती रही. हालांकि ये बात सही है कि कोई भी राष्ट्रपति उम्मीदवार तब तक हार स्वीकार नहीं करता जब तक कि पूरी तरह से वोट काउंट नहीं हो जाते और सभी कानूनी चुनौतियों का हल नहीं हो जाता.

200 सालों से शांति से होता रहा है सत्ता का हस्तांतरण
वर्ष 1800 से ही अमेरिका में सत्ता का हस्तांतरण शांति से करने का रिवाज रहा है. तब देश के राष्ट्रपति जान एडम्स चुनाव हार गए थे और उन्होंने शांति से वाशिंगटन छोड़ दिया. वो इतनी सुबह व्हाइट हाउस से निकल गए कि उन्हें उत्तराधिकारी थामस जेफरसन का सामना नहीं करना पड़े.

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कभी कभी हार देर से स्वीकार करते हैं उम्मीदवार 
कुछ शुरुआती अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने तो अपने विपक्षियों को जीत की बधाई वाले पत्र भी भेजे. 1912 में रिपब्लिकन प्रेसीडेंट विलियम होवार्ड ने चुनाव की रात ही डेमोक्रेट वुडरो विल्सन के खिलाफ हार मान ली. हालांकि कभी कभी हारने वाले उम्मीदवारों ने जरूर अपनी हार स्वीकार करने में समय लगाया.

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अमेरिका में लोकतंत्र का चुनावी इतिहास 225 सालों से ज्यादा पुराना है. हर बार चुनावों के बाद सत्ता और व्हाइट हाउस का हस्तांतरण बहुत शांतिपूर्वक तरीके से होता रहा है.

1916 में रिपब्लिकन चार्ल्स इवांस ह्यूजेस को हार मानकर डेमोक्रेट प्रेसीडेंट वुडरो विल्सन को बधाई देने में दो हफ्ते लग गए. दोनों में चुनावी मुकाबला बहुत नजदीकी था. वोटों की काउंटिंग में दो दिन लग गए थे. शुरु में ऐसा लगा था कि चुनाव ह्यूजेस की ओर जा रहा है.

रेडियो पर हार मानी तो रूजवेल्ट खफा हो गए
1944 रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डेवनी ने अपनी हार तो मान ली लेकिन ये हार रेडियो पर मानी और अपने प्रतिद्वंद्वी को तो ना तो हार मानते हुए जीत की बधाई फोन पर दी और ना ही ऐसा कोई टेलीग्राम ही भेजा. तब राष्ट्रपति एफडी रूजवेल्ट थे. वो बहुत खफा हुए. उन्होंने उल्टे एक टेलीग्राम डेवनी को भेजा, मैने तुम्हारा बयान कुछ मिनट पहले रेडियो पर सुना. तुम्हे इस बयान के लिए धन्यवाद.

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आप हैरान होंगे कि वर्ष 2000 में चुनाव की काउंटिंग, रिकाउंटिंग, सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में दायर याचिकाओं का मामला 36 दिनों तक चला था. हालांकि बाद में जब ये खत्म हुआ तो बेहतर नोट पर हुआ.

सारे विवाद 14 दिसंबर तक निपटा लिए जाएंगे
हालांकि अमेरिका में इस बात का कोई कानूनी घटनाक्रम नहीं मिलता जबकि कोई राष्ट्रपति उम्मीदवार मसलन ट्रंप अपनी हार को मानने से मना कर दे. अमेरिका में वैसे जो भी वोटों को लेकर विवाद हैं, उसे 14 दिसंबर तक निपटा लिया जाएगा. तब तक इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि ट्रंप अपनी हार मानेंगे.
हालांकि बाइडन ने अपने चुनाव अभियान में ही इस बारे में कहा था कि अमेरिका की सरकार सक्षम है कि हारने वाले को व्हाइट हाउस से बाहर कर दे





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