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बाघ (Tigers), पैंगोलिन (Pangolin) और अन्य लुप्त होती वन्य प्रजातियों की कमर्शियल फार्मिंग (Commercial Farming) को इजाज़त देने वाला म्यांमार (Myanmar) का कानून पिछले दिनों चर्चा में था क्योंकि ये एक तरह से चीन की डिमांड (Chinese Demands) पूरी करने की नीति थी. अब, भारतीय फॉरेस्ट विभाग द्वारा चीन में हज़ारों बाघों की फार्मिंग (Tiger Farming in China) किए जाने संबंधी मुद्दा उठाया गया है. इस बीच, आपको जानना चाहिए कि टाइगर फार्मिंग होती क्या है, चीन में कैसे हो रही है और इसके खतरे क्या हैं? साथ ही, ये भी कि बाघों के बॉडी पार्ट्स (Tiger Body Parts Trade) बेचने का अवैध कारोबार कैसे होता है.

इसी साल जुलाई में एक रिपोर्ट में कहा गया था कि वन्यजीवों की तस्करी का एक बड़ा हब म्यांमार है, जो चीन की डिमांड पूरी करने के लिए टाइगर फार्मिंग को बढ़ावा दे रहा है. हालांकि चीन में टाइगर फार्मिंग का मुद्दा पिछले करीब एक दशक से चर्चा में रहा है. सबसे पहले टाइगर फार्मिंग के बारे में जानते हैं.

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टाइगर फार्मिंग : क्या है पूरा सच?खाल, दांत, हड्डियों, नाखूनों और मांस समेत बाघों के कई अंगों के अवैध कारोबार के सिलसिले में बाघों को व्यावसायिक हितों के लिए पालना टाइगर फार्मिंग है. चूंकि भारत समेत दुनिया के कई देशों में बाघ बहुत कम रह गए हैं इसलिए उनके शिकार और उनके बॉडी पार्ट्स के अवैध कारोबार पर लगाम के लिए 2007 में लुप्त होती प्रजातियों को बचाने वाली संस्था CITES ने साफ निर्देश दिया था कि इस तरह की प्रैक्टिस न की जाए.

चीन में एक टाइगर फार्म की तस्वीर ट्विटर से साभार.

चीन के साथ ही दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों और दक्षिण अफ्रीका में टाइगर फार्मिंग की खबरें रहीं. चूंकि चीनी और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में वन्यजीवों के बॉडी पार्ट्स की मांग बनी रही है इसलिए इनके शिकार को बढ़ावा मिलता रहा है. सिर्फ टाइगर ही नहीं, बल्कि हाथी दांत, पैंगोलिन और गेंडे के सींग जैसी वन्य संपदा तस्करी का एक बहुत बड़ा और पूरा नेटवर्क है. अंदाज़ा लगाइए कि इस तस्करी में सिर्फ म्यांमार दुनिया में 20 अरब डॉलर का कारोबार करता है.

चीन में टाइगर फार्मिंग
पारंपरिक तौर पर चीन में मेडिकल साइंस में बाघों के कुछ अंगों का महत्व बताया जाता है. 1980 के दशक में जब चीन में जंगली बाघों की संख्या बेहद कम यानी विलुप्त होने के कगार पर पहुंची तो सरकारी और निजी सेक्टर ने मिलीभगत कर इसे एक व्यावसायिक मौका बनाया. चीन में टाइगर फार्मिंग एक कमोडिटी के तौर पर विकसित हुई, जिसने बाघों के सिस्टेमैटिक शिकार और मुनाफे के लिए तस्करी को बढ़ावा दिया.

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तीन दशकों के बाद अब चीन में 8000 की संख्या तक बाघों को बलि के बकरों की तरह पाला जा रहा है. चीन में कम से कम ऐसे 200 फार्म हैं, जहां बहुत कम जगह में कई बाघों को एक साथ रखा जाता है. इस बारे में आईएफएस सुशांत नंदा का हालिया ट्वीट खासा चर्चित हो रहा है, जो चीन की बर्बर प्रैक्टिस पर सवाल खड़े करता है. पहले भी कई रिपोर्ट्स कह चुकी हैं कि चीन के इन फार्मों में बाघों को भयानक स्थितियों में रखा जाता है.

कुछ रिपोर्ट्स ये भी बता चुकी हैं कि पिंजरे में रखे जा रहे इन बाघों की मानसिक और शारीरिक सेहत बहुत खराब है और तो और, अत्याचारी स्थितियों में रखे जा रहे इन बाघों में आनुवांशिक विकृतियां तक पैदा हो गई हैं.

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संरक्षण छलावा है, सब पैसे का खेल है
20वीं सदी की तुलना में टाइगरों की संख्या पृथ्वी पर 96% तक कम हो चुकी है. बाघों की चमड़ी, हड्डियों और बॉडी पार्ट्स के लिए चीन की मांग को पूरा करने के लिए शिकार और तस्करी इसके बड़े कारण रहे. दुनिया को दिखाने के लिए बाघों के संरक्षण के नाम पर खोले गए इन फार्मों की हकीकत ये है कि ये सब मुनाफे का खेल है. साल 2010 में एक रिपोर्ट आई थी कि ऐसे एक चीनी टाइगर पार्क में फ्रीज़र में बाघों के 200 शव रखे मिले थे.

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भविष्य के कारोबार के लिए इन्हें फ्रीज़र में सहेजा जाता है. हार्बिन साइबेरियन टाइगर पार्क, झियोंगसेन बीयर और टाइगर विलेज जैसे कई चीनी फार्मों के बारे में ये खुलासा हो चुका है कि ये बाघों के बॉडी पार्ट्स की तस्करी और कारोबार में शामिल रहे हैं. यहां तक कि ये जो ‘शराब’ बेच रहे थे, उसमें भी बाघों की हड्डियों को अल्कोहल में डुबोकर रखे जाने की बात सामने आई थी.

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1993, 2005 और 2013 में कई मौकों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने टाइगर बोन और बॉडी पार्ट्स कारोबार पर रोक लगाने के कई निर्देश दुनिया भर में दिए लेकिन इन सबकी अनदेखी कर चीन लगातार यह कारोबार कर रहा है. विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाकर बाघों की ये दुर्दशा रोकी जा सकती है, तो कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मांग रहेगी, ये अत्याचार होते रहेंगे.

एशिया में बाघों का कारोबार
वन्यजीव व्यापार को मॉनिटर करने वाली संस्था TRAFFIC की पिछले साल की रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले दो दशकों में थाईलैंड में जिन्हें कैद में रखा गया था, उनमें से आधे से ज़्यादा बाघों और वियतनाम से एक तिहाई बाघों का छुड़ाया गया, लेकिन चिंता यही है कि टाइगर फार्मिंग बॉडी पार्ट्स के अवैध कारोबार के साथ ही मांग और शिकार को बढ़ावा दे रहा है.

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जबकि दुनिया भर में कुल मिलाकर 4000 से भी कम वाइल्ड टाइगर बचे हैं, तब इसके दोगुने से भी ज़्यादा संख्या में बाघ सिर्फ चार देशों चीन, थाईलैंड, वियतनाम और लाओस की कैद में हैं. इसके अलावा, म्यांमार जैसे कुछ देश भी बाघों के इस अवैध कारोबार के हिस्से हैं तो दक्षिण अफ्रीका में वाइल्ड टाइगर तो नहीं हैं लेकिन बाघों को अच्छी खासी संख्या में एशियाई देशों को बेचा जाता है.

भारत का रुख
टाइगर फार्मिंग पर भारत का रुख यह रहा है कि सालों से वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन को इस तरह की टाइगर फार्मिंग को बंद करने की सलाह देता रहा है. यही नहीं, भारत में बाघों का शिकार न हो, इसके लिए टाइगर रिज़र्व में पर्यटन तक बंद किए जाने जैसे कदम उठाए जाते रहे हैं.





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