अगर आप भी थोड़ा रिस्क लेने को तैयार हैं और अच्छा रिटर्न चाहते हैं तो एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में पैसा लगाना आपके लिए सही विकल्प होगा. आइए जानें नए मिए
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ईटीएफ पर क्यों बढ़ रहा म्यूचुअल फंडों का जोर

वैसे तो भारत में ईटीएफ का अस्तित्व पिछले 20 साल से है, लेकिन ईटीएफ में बढ़त वास्तव में पिछले 5-6 साल में देखी गई है. भारत में ईटीएफ का एयूएम बढ़ने की कुछ वजहें इस प्रकार हैः

सरकारें ईटीएफ का इस्तेमाल विनिवेश के एक पसंदीदा मार्ग के रूप में कर रही हैं, इसकी वजह से छोटे निवेशकों की भागीदारी बढ़ी है.ईपीएफओ और निजी पीएफ संस्थाएं ईटीएफ का इस्तेमाल शेयर बाजार में अपना निवेश बढ़ाने के लिए कर रही हैं.

एक्टिव फंड में अल्फा यानी बाजार से बेहतर रिटर्न हासिल करने की गुंजाइश घटने जाने से आम निवेशक भी निफ्टी, सेंसेक्स जैसे ईटीएफ के फायदों के प्रति जागरूक हो चुके हैं.

जब बाजार परिपक्व और प्रभावी होता है तो अल्फा के अवसर घटते जाते हैं. हम शायद ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जब बड़ा अल्फा हासिल करना बहुत कठिन हो गया है. ऐसी हालात में कोई निवेशक ईटीएफ जैसे उत्पादों का ज्यादा हिस्सा अपने पोर्टफोलियो में रख सकता है ताकि बेंचमार्किंग के मुकाबले काफी कमतर प्रदर्शन के जोखिम से बचा जा सके और निवेश के द्वारा सतत रूप से संपदा का सृजन किया जा सके.

किसी ईटीएफ में निवेश की सबसे आवश्यक विशेषता एक डीमैट/ट्रेडिंग अकाउंट रखना है, क्योंकि ईटीएफ की किसी एक्सचेंज पर शेयरों की तरह ही खरीद-फरोख्त की जाती है. हम यदि सेबी द्वारा जारी आंकड़ों को देखें तो वित्त वर्ष 2020 में सबसे ज्यादा डीमैट अकाउंट खोले गये.

31 मार्च 2020 तक नए जुड़ने वाले डीमैट अकाउंट की संख्या 49 लाख तक पहुंच गई थी और एक साल पहले के मुकाबले यह 22.5 फीसदी ज्यादा था. एक पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा बढ़त है. आगे की बात करें तो यह संख्या और बढ़ेगी, क्योंकि निवेशक अपना धन वित्तीय एसेट में लगाना चाहेंगे. नए डीमैट अकाउंट खुलने से ईटीएफ की तरक्की को प्रोत्साहन मिलेगा, क्योंकि इससे छोटे निवेशक सीधे ईटीएफ में निवेश कर पाएंगे.





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