इंसान (Human) के शरीर का औसत तापमान (Average Temperature) में बदलाव एक अहम पड़ताल साबित हो सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
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करीब दो सौ साल पहले जर्मन (German) फिजिशियन कार्ल वुंडरलिच ने बताया था कि इंसान के शरीर (Human Body) का औसत तापमान (Average Temperature) 98.6 डिग्री फेहरनहाइट है. तब से अब तक डॉक्टर (Doctor) से लेकर बच्चों के माता –पिता तक इससे मानक मानते हुए बीमार लोगों का बुखार (Fever) नापते आ रहे हैं कि वह कितना तीव्र है. लेकिन हाल के कुछ सालों में स्वस्थ्य व्यस्कों में शरीर का औसत तापमान कम हो गया है.

दो साल के दो अध्ययन
साल 2017 में यूके में हुए एक अध्ययन में 35 हजार व्यस्कों के शरीर का औसत तापमान कम पाया गया है जो कि 97.9 डिग्री फेहरनहाइट पाया गया. वहीं साल 2019 में किए गए एक अन्य अध्ययन में अमेरिका के पालो आल्टो और कैलीफोर्निया के लोगों में शरीर का औसत तापमान 97.5 डिग्री फेहरनहाइट पाया गया.

ताजा शोधहाल ही में यूसी सांता बारबरा के मनवशास्त्र के प्रोफेसर माइकल गूर्वन की अगुआई में अंतरराष्ट्रीय फिजिशियन, मानवशास्त्रियों और स्थानीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने इस तरह की तापमान में कमी बोलिविया के अमेजन के स्थानीय जनसंख्या के साइने लोगों में पाया है.

16 साल से लोगों पर अध्ययन
साइने हेल्थ एंड लाइफ हिस्ट्री प्रोजेक्ट के सह निदेशक गूर्वन और उनके साथी शोधकर्ता 16 साल से इस जनसंख्या का अध्ययन कर रहे हैं. उन्होंने यहां औसत शारीरिक तापमान में तेजी से गिरावट देखी है. यह तापमान 0.09 डिग्री फेहरनहाइट प्रतिवर्ष की दर से कम हो रहा है. इस तरह से आज साइने लोगों में औसत शारीरिक तापमान 97.7 डिग्री फेहरनहाइट है.

लंबे समय के बाद इंसान (Humans) के शरीर (Body) का औसत तापमान (average temperature) में कमी होती देखी गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

दो दशकों से कमी
गूर्वन का कहना है, ‘पिछले दो दशकों से हम एक ही दर की कमी देख रहे हैं जैसे कि अमेरिका में दो सौ साल पहले देखा गया था.” गूर्वन की टीम के विश्लेषण में 18 हजार नमूने लिए गए थे. जिसमें 5,500 व्यस्क थे. इस अध्ययन में आसपास के तापमान और शरीर के वजन जैसे कारकों को भी शामिल किया गया था जो शरीर के तापमान को सीधे प्रभावित कर सकते थे.

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दो सौ साल पुराने अध्ययन में
यह मानवशास्त्रीय शोध साइंसेस एडवांसेस जर्नल प्रकाशित हुआ है. गूर्वन ने बताया कि दो सौ साल पहले अमेरिका मे हुए गृह युद्ध के दौरान वहां औसत शारीरिक तापमान में कमी पर हुआ अध्ययन एक ही जनसंख्या पर हुआ था और उससे यह पता नहीं चल सका था कि यह कमी क्यों हुई थी.

क्या पता चलता है
इस पर बात करते हुए गूर्वन ने बताया, “यह साफ था कि इंसान की शारिरिक क्रिया विज्ञान बदल सकता है. एक प्रमुख मत यह है कि हमें कम संक्रमण हुए, बेहतर हाइजीन हुई, साफ पानी, वैक्सीन और इलाज मिला. हमारे अध्ययन में हम इस विचारों को सीधे परख सकते थे. हमारे पास हर मरीज को देखे जाने के समय के क्लीनिकल निदान और संक्रमण आदि के बायोमार्कर्स की जानकारी है.

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शोधकर्ताओं ने पिछले सौ सालों में इंसान (Human) के बेहतर स्वास्थ्य (Health) को इसकी वजह होने की पड़ताल भी की.. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

सबसे अहम सवाल और संभावनाएं
इस मामले में अहम सवाल यही था कि अमेरिकी और साइने लोगों के लिए शरीर का तापमान क्यों कम हुआ. इस पर शोधकर्ताओं ने पहले की तुलना में बेहतर स्वास्थ्य को कारण के रूप में विचार किया, लेकिन उनका मानना है कि यह अकेला ही इसकी वजह नहीं हो सकता. इसके अलावा शोधकर्ताओं ने संक्रमण और बीमारियों से कम जूझने, आधुनिक दवाओं का उपयोग, लोगो में श्रम करने की आदत का कम होना, अपने शरीर को तापमान विविधताओं से बचा कर रखना, जैसे कारकों पर भी विचार किया, लेकिन कोई भी इसमें निर्णायक और एकमात्र कारण नजर नहीं आया.

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शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया में कोई भी सार्वभौमिक सामान्य शारीरिक तापमान नहीं होता. हर इंसान का दिन भर तक में तापमान एक डिग्री कम ज्यादा होता रहता है. फिर भी यह इस अध्ययन के नतीजे दूसरे बड़ी जनसंख्या पर होने वाले शोधों के लिए उपयोगी हो सकते हैं.





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