दिल्ली बॉर्डर पर किसान पिछले 20 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं.


नई दिल्ली, रविशंकर कपूर| कृषि कानून (Farm Law) के खिलाफ जारी किसान आंदोलन (Farmers Agitation) ने ”कॉरपोरेट्स” के लिए भारतीयों के मन में व्याप्त डर और घृणा को उजागर कर दिया है. साथ ही बड़ी कंपनियों के लिए भयावह को भी… दरअसल कृषि कानून को लेकर सबसे बड़ी शिकायत ये बताई जा रही है कि बड़ी कंपनियां कृषि उपज पर अधिकार जमा लेंगी, संघ बना लेंगी और फिर किसानों का शोषण शुरू कर देगी. प्रदर्शन ने एक और चीज रेखांकित की है और वो है भारतीयों की दोहरी सोच (Doublethink). जॉर्ज ऑरवेल ने अपने उपन्यास 1984 में इसे ”एक मस्तिष्क में दो परस्पर विरोधाभासी विचार को बनाए रखने और दोनों पर एक साथ विश्वास करने” के रूप में परिभाषित किया है.

इससे पहले कि हम दोहरी सोच के दुष्परिणामों पर चर्चा करें, पहले इसके कुछ जीवंत उदाहरण देख लीजिए. एक कारण जिसके चलते ज्यादातर अराजनीतिक लोग किसानों के साथ हमदर्दी जताएंगे, वो ये है कि बड़ी कंपनियां खराब होती हैं. ये दशकों तक समाजवादी मूल्यों वाले शासन का दुष्परिणाम है. वास्तव में ये हमारे स्कूल और कॉलेजों की देन है और धन्यवाद उन एकेडमिक्स और बुद्धिजीवियों का, जिन्होंने इसके लिए कोशिशें कीं. समाजवाद के झूठ ने सच की आभा ओढ़ ली है, और इनमें से एक है कि बड़ी कंपनियां गरीबों का शोषण करती हैं और अब वे किसानों को लूट लेंगी.

बहरहाल, प्रदर्शनकारी किसानों से लेकर विपक्षी नेताओं, फिल्म कलाकार, खिलाड़ी और सेलेब्रिटी बनने की चाहत रखने वाले लोग कृषि कानून के खिलाफ बता रहे हैं. जबकि कृषि कानून, आजादी के बाद कृषि क्षेत्र में हुई सबसे बेहतरीन चीज है. भारत में सार्वजनिक परिचर्चा और बहस आमतौर पर बड़ी कंपनियों के खिलाफ रही है. हमारे बुद्धिजीवी बड़ी कंपनियों के खिलाफ माहौल बनाने में कभी पीछे नहीं रहे. हमें बताया गया कि बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों का शोषण करती हैं, नेताओं और अफसरों को घूस देती हैं, नियम-कानून को तोड़ती-मरोड़ती है और टैक्स देने से बचने के साथ पर्यावरण को तबाह करती हैं.

बावजूद इसके अगर आप किसी बुद्धिजीवी या किसी व्यक्ति से पूछे कि क्या वो किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करना चाहेंगे या फिर अपने बच्चों के लिए किसी बड़ी कंपनी में नौकरी की चाहत रखते हैं, तो उनका जवाब होगा, हां… सब जानते हैं कि बड़ी कंपनियां अच्छी सैलरी देती हैं, काम करने का अच्छा माहौल होता है और छोटी कंपनियों की तरह सनक और इच्छाओं के भरोसे नहीं चलती हैं. कम से कम निचले और मध्यम स्तर पर, वे सब बड़ी कंपनियों के साथ काम करने को लेकर खुश हैं.हालांकि बात जब पब्लिक पॉलिसी की आती है, तो सब कहते हैं कि बड़ी कंपनियां बहुत ज्यादा शोषण करती हैं. लेकिन, जो चीज उनके लिए अच्छी है, वो देश के लिए ठीक नहीं है. अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है और किसानों के लिए तो बिल्कुल ठीक नहीं है.

इसी तरह संस्कारी लोग मानते हैं कि आयुर्वेद दुनिया की बेहतरीन इलाज पद्धति है. लेकिन, जब खुद की बारी आती है तो अपने बच्चों को एमबीबीएस, एमएस और एमडी की डिग्री के साथ एलोपैथिक डॉक्टर बनाना चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे आयुर्वेदिक डॉक्टर बनें. संस्कारियों का जोर है कि दुनिया में भारत एकमात्र देश है, जहां पैदा होने के लिए ईश्वर भी लालायित रहते हैं. लेकिन खुद के इलाज के लिए ये लोग अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे पश्चिमी देशों को भागते हैं. वहां बसने के लिए तो छटपटाते रहते हैं. अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए तो ये लोग इन्हीं देशों को प्राथमिकता देते हैं. बड़े गर्व और शौक से ग्रीन कार्ड और अपने बेटे-बेटियों के परमानेंट रेजिडेंसी कार्ड को हवा में लहराते हैं.

ये बताने की आवश्यकता है कि सिर्फ संस्कारी लोग ही दोहरी सोच के शिकार नहीं हैं. वामपंथी इन्हें कड़ी चुनौती पेश करते हैं. वामपंथी अध्ययन के दौरान हमेशा पश्चिमी देशों और उनके शासन के विरूद्ध स्टैंड लेंगे और इनमें से तेजतर्रार लोग पश्चिमी देशों की यूनिवर्सिटी में जाकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के अभिशाप पर थिसिस लिखेंगे. वामपंथी विचारधारा वाले कितने लोग समतावादी स्वर्ग के समान चीन, उत्तर कोरिया और क्यूबा में जाकर बसे हैं?

दोहरी सोच एक अलग ही बूटी है और पाखंड के मुकाबले तो ये विनाशक है. ऑरवेल ने लिखा है, ”जानना और नहीं जानना, गढ़े गए झूठ को सर्तकता से बताते हुए सच्चाई के प्रति पूर्ण रूप से सतर्क रहना, एक ही साथ उन दो विचारों को दिमाग में रखना जिन्हें खारिज कर दिया गया हो, ये जानना कि दोनों विरोधाभासी हैं फिर भी उनमें विश्वास करना, तर्क के खिलाफ तर्क का उपयोग करना, नैतिक मूल्यों को धता बताना और खुद के नैतिक होने का दावा करना, ये विश्वास रखना कि लोकतंत्र असंभव है और ये भी कि पार्टी ही लोकतंत्र की रक्षक है…”

ये विश्वास रखना कि कॉरपोरेट सेक्टर हमारा शोषण करता है और बड़ी कंपनी में नौकरी पाने के लिए तैयारी करते रहना, ये दावा करना कि भारत दुनिया का महान देश है और कनाडा में स्थायी तौर पर बसने के बारे में सोचना. इस बात पर जोर देना कि पश्चिमी देश ढलान पर हैं और अमेरिका-यूरोप में नौकरी ढूंढ़ना… क्या ये शानदार दोहरी सोच नहीं है?

पाखंड के मुकाबले दोहरी सोच खतरनाक है, क्योंकि पाखंडी व्यक्ति को किसी भी समय अंतरात्मा की आवाज सुनाई पड़ सकती है. स्कॉच को पसंद करने वाला सामाजिक कार्यकर्ता शराब पर पाबंदी की वकालत करते हुए अपने पाखंड पर शर्मिंदगी महसूस कर सकता है. कारण ये है कि वह अपनी हकीकत से पूरी तरह दूर नहीं हुआ है. ना ही उसने सोचना छोड़ा है. लेकिन, दोहरी सोच वाले आदमी के लिए दोहरी सोच का मतलब कोई विचार नहीं होता है. एक ही साथ दो विरोधाभासी विचारों को मानने वाला दोनों को खारिज कर देता है. X और -X का जोड़ हमेशा शून्य होता है और जो गणितीय रूप से सही है वह तार्किक रूप से भी सही है. दोहरी सोच वाले आदमी को खेद भी नहीं होता है और वह सच्चाई से भी दूर रहता है.

दुख इस बात का है कि जॉर्ज ऑरवेल के कल्पना लोक में जहां दोहरी सोच को आधिकारिक तौर पर बढ़ावा दिया जाता है, वहीं भारत में इसे जबरदस्ती फैलाया जा रहा है. परिणाम ये है कि भारत एक बिना विचार का राष्ट्र बन गया है, जोकि प्रो-एक्टिव के बजाय रिएक्टिव है. हमारे यहां चीजें घटित होती हैं और हम उस पर प्रतिक्रिया देते हैं. कभी-कभी, जैसे कि 1991 के आर्थिक संकट के समय, उत्तर भारत में पराली जलाने के मुद्दे पर, मुंबई की बारिश और कोरोना वायरस महामारी पर भारत का रुख रि-एक्टिव रहा है.

wAAACH5BAEAAAAALAAAAAABAAEAAAICRAEAOw==

किसी तरह की सोच ना होने से भावना आधारित चीजें घटित होती हैं, दिखावटी नैतिकता को बढ़ावा मिलता है और नीतिगत भ्रम की स्थिति बनती है. दूषित और पीछे खींचने वाला किसान आंदोलन भी ऐसा ही एक उदाहरण है.

डिस्क्लेमरः लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.





Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here